क्या RSS की तरह रणनीति बना रहीं मायावती !
‘मायावती ने लखनऊ में रैली की तो भीड़ उमड़ पड़ी। ये वो भीड़ थी, जो अपने साथ रोटियां बांधकर लाई थी। सोचिए कितनी कमिटेड जनता होगी, जो सिर्फ मायावती के नाम पर इकट्ठी हुई। वरना रैलियों में लोग तब जाते हैं, जब कम से कम खाने-पीने का अच्छा इंतजाम हो। कई बार तो लोग बारात जैसा स्वागत मांगते हैं।’
सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ अग्निहोत्री इसे सिर्फ बसपा की रैली नहीं बल्कि मायावती की सक्रिय राजनीति में वापसी मान रहे हैं। वो कहते हैं कि ये रैली मायावती का वो मजबूत वोट बैंक दिखाती है, जिसे उनके दोबारा एक्टिव होने का इंतजार है।
बसपा के एक लीडर इस पर मुहर लगाते हुए कहते हैं, ‘मायावती यूपी के सभी 18 मंडल समेत पश्चिम यूपी के 5-7 जिलों में नाइट कैंपिंग के लिए हां कर चुकी हैं। पिछली बार तो मायावती जी ने चुनाव के ठीक पहले ही कुछ रैलियां की थीं, लेकिन इस बार कोशिश होगी कि उनकी ज्यादा से ज्यादा रैलियां हों।’
दरअसल, 2007 के बाद से मायावती की राजनीतिक सक्रियता लगातार घटती गई। इसका असर सीट के नंबर और वोटर शेयर पर भी दिखा। 2007 में 206 सीट और 30.4% वोट शेयर हासिल करने वाली बसपा 2012 में 80 सीट और 25.9% वोट शेयर पर आ गई। 2017 में 19 सीट के साथ ये वोट शेयर 22% और 2022 में 1 सीट के साथ 13% पर आ गया।
2027 में यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस बार मायावती की चुनाव को लेकर क्या स्ट्रैटजी है, चुनाव में वो किसे अपना मुकाबला मानकर रणनीति बना रही है? क्या इस बार वो RSS की तरह घर-घर पहुंचने की तैयारी में हैं? दैनिक भास्कर ने बसपा में अपने सोर्सेज, पार्टी लीडर्स और पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स से समझने की कोशिश की।

यूपी चुनाव में दिखेगी मायावती की धमक
बसपा में हमारे सोर्स बताते हैं, ‘इस बार मायावती यूपी के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नहीं, बल्कि अभी से अपनी मौजूदगी दर्ज कराना शुरू कर चुकी हैं। 9 अक्टूबर को लखनऊ की रैली और उसके बाद 19 नवंबर को दिल्ली में 5 बैठकें कीं। ये तो अभी प्रोमो है, पूरी पिक्चर में मायावती मुख्य किरदार में नजर आएंगी।‘
इस बार इतनी सक्रियता क्यों? इस पर जवाब मिला, ‘बसपा सुप्रीमो समझ चुकी हैं कि दलितों की पॉलिटिक्स के लिए अगर जगह छोड़ी गई तो वहां कोई और आ सकता है। कई दशकों की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।‘
देखिए, कोई भी अपनी विरासत जीते जी किसी को ले नहीं जाने देना चाहता है। उनके करीबियों ने भी उन्हें समझाया है।

‘आप ही बताइए चंद्रशेखर आजाद जैसे छुट भैय्या नेता ने अपनी जगह सिर्फ इसीलिए बना ली क्योंकि मायावती गायब थीं। इसीलिए अब वो अपने पारंपरिक वोटर ही नहीं, मुसलमान वोटरों को भी हाथ से नहीं जाने देना चाहती हैं। इस बार मायावती दोनों को साधने का प्लान बना रही हैं।’
वे आगे बताते हैं, ‘अगले एक साल में मायावती लखनऊ की ही तरह कम से कम 6 रैलियां और मंडल के कार्यकर्ताओं के साथ 20 बैठकें करेंगी। अभी इस पर मुहर तो नहीं लगी है, लेकिन वे अपने कुछ कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए उनके घर भी पहुंच सकती हैं।’
मायावती 18 मंडलों में गुजारेंगी रात, चाय-डिनर पर बनेगी रणनीति
यूपी के विधानसभा चुनाव के लिए मायावती की और क्या तैयारियां हैं? ये पूछने पर सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ अग्निहोत्री बताते हैं, ‘मैं करीब 35 साल से बसपा को कवर कर रहा हूं। कुछ साल कांशीराम की राजनीति देखी। मायावती की राजनीति भी नजदीक से देख चुका हूं। यकीनन वो इस बार गहरी रणनीति बना रही हैं।’
‘इस बार मायावती यूपी के 18 मंडलों में नाइट कैंप करेंगी। इससे पहले उन्होंने कांशीराम के साथ ही नाइट कैंपिंग की थी। तब वो साइकिल से गांव-गांव तक घूमी थीं, लेकिन जब से वो मायावती बनीं यानी बसपा सुप्रीमो और फिर CM, तब से कभी न नाइट कैंप हुए और न साइकिल बाहर निकली।’
‘हालांकि इस बार मायावती बसपा सुप्रीमो बनकर नहीं बल्कि कांशीराम के साथ वाली मायावती बनकर कार्यकर्ताओं के बीच जाएंगीं। उनकी नाइट कैंपिंग का मतलब सिर्फ बैठक लेना नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ दिन-रात गुजारना और उनमें पहले जैसा जोश भरना है।’
बसपा के एक लीडर पहचान जाहिर नहीं करना चाहते, लेकिन इस दावे को कन्फर्म करते हैं। वे कहते हैं, ‘इस बार कोशिश होगी कि उनकी रैलियां ज्यादा हों और कोई इलाका न छूटे। इसलिए 2026 में ही फरवरी-मार्च से रैलियों का सिलसिला शुरू हो जाएगा।’

चार मकसद के साथ होगी रात की चौपाल
1. सोर्स के मुताबिक, ये नाइट कैंप वैसा ही होगा, जैसा किसी परिवार में उसका मुखिया तय करता है कि आज पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाना खाएगा और अपना दुख-दर्द बांटेगा। ये कार्यकर्ता और बसपा सुप्रीमो के बीच बने गैप को भरने का काम होगा।
2. पार्टी कार्यकर्ताओं से बसपा सुप्रीमो खुद फीडबैक लेंगी, ताकि उस पर आगे काम किया जा सके।
3. इस दौरान पार्टी का विस्तार भी किया जाएगा। हर कार्यकर्ता अपने साथ कुछ नए लोगों को लाएगा, जो पार्टी से जुड़ना चाहते हैं।
4. नाइट कैंप का जोर-शोर से प्रचार किया जाएगा और संदेश देने की कोशिश होगी कि उनकी नेता मायावती लौट आई हैं। ताकि दलित वोटर आश्वस्त हो जाएं और जो वोटर मजबूरी में छिटका है, उसे वापस लाया जा सके।

MY की काट DM पर काम शुरू, अखिलेश को चक्रव्यूह में फंसाने की तैयारी
बसपा सुप्रीमो ने इस बार सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए अभी से चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है। सोर्स के मुताबिक, ‘इस चुनाव में मायावती और ओवैसी एक साथ होंगे। दोनों में बातचीत हो चुकी है। सीट शेयरिंग पर बात लगभग फाइनल है।’
जब बसपा लीडर और प्रवक्ता एमएच खान से इस बारे पूछा गया तो वो कहते हैं, ‘मायावती कब मुसलमानों के साथ नहीं थीं। आप पिछले चुनाव का डेटा देखिए, उन्होंने हमेशा मुसलमानों को बड़ी संख्या में टिकट दिया।’ हालांकि ओवैसी के साथ गठजोड़ पर वो कहते हैं, ‘इस पर फैसला बसपा सुप्रीमो ही करेंगी। वो जो भी फैसला करेंगी, सबको मंजूर होगा।’
वहीं इसे लेकर सीनियर जर्नलिस्ट अमिताभ का कहना है, ‘पश्चिमी यूपी में चौधरी चरण सिंह की पार्टी ने जाट-मुसलमान पॉलिटिक्स की। वहां ये फॉर्मूला खूब हिट भी था। हालांकि 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के बाद ये फॉर्मूला टूट गया। चौधरी चरण सिंह के वारिस अजीत सिंह भी खत्म हो गए। हालांकि ये फॉर्मूला टेस्टेड तो है ही। दलित-मुस्लिम अगर मिल गए तो करीब 23-24% वोट एक हो जाएगा। ये इतनी बड़ी संख्या है जो चुनाव को प्रभावित करेगी।’

बसपा के युवा दलित कार्यकर्ता कहते हैं, ‘ये DM समीकरण सबसे ज्यादा अखिलेश यादव को नुकसान पहुंचाएगा और यही दलित चाहता है। क्योंकि यूपी में दलित सबसे ज्यादा यादवों का सताया हुआ है। ब्राह्मण का तो बस नाम भर है। दलित और मुसलमान को एक साथ आने में कोई दिक्कत नहीं।’
‘काम शुरू हो चुका है। हमारी टीमें तैयार हैं, ये टीमें शोर मचाकर नहीं, घर-घर पहुंचकर चुपचाप काम कर रही हैं, ताकि चुनाव से कम से कम 6 महीने पहले हम एक आंकड़ा तैयार कर सकें। फिर इस गठजोड़ को लेकर अपनी तैयारी और पुख्ता कर सकें।’
क्या RSS की तरह चुपचाप घर-घर जाकर बैठक कर रहे हैं?
वे कहते हैं, ‘RSS एक बेहतर रणनीति बनाने और उस पर काम करने वाला संगठन है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। अगर किसी से कुछ सीख मिले तो सीखने में क्या बुराई है?’
पश्चिमी यूपी के ये युवा कार्यकर्ता अपनी पहचान नहीं जाहिर करना चाहते हैं। उनका कहना है कि हमें ऊपर से निर्देश है कि हमें वोटरों के बीच में ही बोलना है। मीडिया से रणनीति पर ज्यादा बात नहीं करनी है। चुनाव जब करीब होंगे तो खुद मायावती ही इस बारे में बताएंगी।

मिश्रा-माया और भतीजे आकाश की तिगड़ी हुई एक्टिव
बसपा में हमारे सोर्स ने बताया, ‘इन दिनों मायावती और उनके मुंह बोले भाई सतीश चंद्र मिश्रा की करीबी बिल्कुल वैसे ही है जैसे- साल 2007 में थी। बैठकों का सिलसिला बढ़ गया। मायावती, उनके भतीजे आकाश और मिश्रा की तिगड़ी ही इस समय पार्टी में प्रमुख है।’
सोर्स ने ये भी बताया कि आकाश के साथ मतभेद खत्म करने में भी सतीश चंद्र मिश्रा का अहम रोल रहा। मायावती इस बार रैलियों और चौपालों में कार्यकर्ताओं और वोटरों को ये भी बताएंगी कि कांशीराम के जाने के बाद जिस तरह मायावती ने दलित हितों को आगे बढ़ाया, वैसे ही उनके बाद ये काम आकाश करेंगे।
क्या BJP की B-पार्टी है बसपा?
बसपा प्रवक्ता एमएच खान कहते हैं, ‘ये सिर्फ विपक्ष का दुष्प्रचार है। वो जानबूझकर ऐसा करता रहता है। पहले जब गठबंधन हुए थे, उस वक्त परिस्थितियां अलग थीं। अब अलग हैं। फिलहाल हम BJP के सामने चुनौती बनकर खड़े होंगे, न कि उसके साथ।’
हालांकि बसपा के एक सोर्स ने ये भी बताया कि पार्टी का पहला टारगेट सपा को चुनौती देना है। BJP नंबर दो पर है और राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता। हां, सपा इस चुनाव में स्थायी दुश्मन है। इतना मैं कह सकता हूं।
मायावती के पुराने साथी बोले- बहन जी को समझना नामुमकिन सा
हमने मायावती के साथ 36 साल राजनीति कर चुके नसीमुद्दीन सिद्दीकी से भी बात की। वे 8 साल पहले उनसे अलग हो चुके हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी का मानना है कि मायावती की स्ट्रैटजी समझ पाना संभव नहीं है।’
वे बताते हैं, ’अचानक एक दिन बहनजी ने लखनऊ के उसी मैदान में रैली बुलाई जहां अभी रैली की है और BJP के साथ गठबंधन तोड़ दिया। इसके लिए न किसी से मशविरा लिया, न कोई बैठक की।’
आप उस वक्त सरकार में सीनियर मंत्री थे। क्या वो अपने सीनियर मंत्रियों से भी मशविरा नहीं लेती थीं? ‘नहीं, उनके अपने कुछ खास लोग थे। अब मैं उनका नाम नहीं लूंगा। मेरी उनसे भी कोई दुश्मनी नहीं है। मशविरा उन्हीं से लिया जाता था।’ क्या आपका इशारा सतीष चंद्र मिश्रा की तरफ है। ‘नहीं, मैं किसी का नाम नहीं लूंगा।’
मायावती 6 दिसंबर को नोएडा में रैली करेंगी
मायावती, बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस यानी 6 दिसंबर को नोएडा में विशाल रैली करने जा रही हैं। इस रैली के जरिए मायावती एक बार फिर अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन करेंगी। विरोधियों को ये संदेश देने की कोशिश करेंगी कि बसपा का कैडर आज भी उनके साथ मजबूती से खड़ा है।
नोएडा की रैली के जरिए मायावती नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर में अपने खोए वोटरों को साधने की तैयारी में हैं।

