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वंदे मातरम् का वो शब्द जिससे अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डाली !

वंदे मातरम् का वो शब्द जिससे अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डाली, जिन्ना ने लिखा था नेहरू को पत्र

Vande Mataram Debate: वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर लोकसभा में इस पर चर्चा हो रही है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चर्चा को संबोधित करते हुए याद दिलाया कि ‘जब अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई थी, तब किस प्रकार यह राष्ट्रीय गीत एकता का आह्वान बन गया था.’ जानिए, कैसे अंग्रेजों ने इसके शब्दों को लेकर हिन्दू-मुस्लिमों के बीच फूट डाली और क्या निकला इसका हल.

Vande Mataram: वंदे मातरम् का वो शब्द जिससे अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डाली, जिन्ना ने लिखा था नेहरू को पत्र

PM मोदी ने लोकसभा में ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने पर चर्चा की.
देश के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् पर लोकसभा में 10 घंटे चर्चा होगी. इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर दी है. वंदे मातरम् के 150 साल पूरे हो गए हैं. यह बंकिम चंद्र चटर्जी की वो रचना है जिसे उन्होंने 7 नवंबर, 1875 को रचा. यह गीत पहली बार पत्रिका बंगदर्शन में उनके उपन्यास आनंदमठ के हिस्से के रूप में छपा. 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम् गाकर इतिहास रचा था. यह पहला मौका था जब वंदे मातरम् राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक रूप से गाया गया. हजारों लोगों की आंखे नम थीं.

धीरे-धीरे यह गीत आजादी के आंदोलनों में दूर-दूर तक गूंजने लगा. अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारियों में जोश भरने लगा. 1905 में बंगाल विभाजन का विरोध करने वाले हर आंदोलनकारी की जुबान पर यही गीत था. सभा हो या रैली-प्रदर्शन, हर जगह यह गीत ऐसा गूंजा कि अंग्रेजों के अंदर डर भर दिया. 1907 में अंग्रेजों ने इस पर पाबंदी लगा दी. अंग्रेजों ने इस गीत को आधार बनाकर हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालने का काम किया.

कैसे पैदा हुआ वो विवाद, जिसकी आज भी चर्चा होती है?

अंग्रेजों ने हमेशा से ही ‘बांटो और राज करो’ की नीति के जरिए हिंदुओं-मुसलमानों के बीच दूरियां पैदा करने की कोशिश की. जब हर तरफ लोगों की जुबान पर वंदे मातरम् गीत था तब अंग्रेजों ने इसे धर्म के नाम पर बांटने का जरिया बनाया.

इस गीत के शब्दों को लेकर मुस्लिम लीग को उकसाने का काम किया. 1909 के अमृतसर में हुए अधिवेशन में वंदे मातरम् का विरोध हुआ. अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने इसे मुद्दा बनाते हुए वंदे मातरम् को इस्लाम विरोधी बताया. इसे सांप्रदायिक बताते हुए अस्वीकार कर दिया.

Vande Mataram Debate In Lok Sabha Which Word Make It Controversial Hindi Muslim Split

वंदे मातरम् को रचने वाले बंकिम चंद्र चटर्जी.

वो शब्द जिस पर छिड़ा था विवाद

वंदे मातरम् गीत में देश को देवी दुर्गा के रूप में देखा गया और उन्हें ‘रिपुदलवारिणी’ यानी दुश्मनों का संहार करने वाला कहा गया. इसी ‘रिपुदलवारिणी’ शब्द को लेकर बड़ा विवाद हुआ था. मुस्लिम समुदाय को लगता था कि रिपु यानी दुश्मन शब्द का इस्तेमाल उनके लिए किया गया है, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय अंग्रेजों को रिपु यानी दुश्मन माना गया.

यह विवाद थमा नहीं. मुस्लिम लीग ने इसे इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ बताया. तर्क दिया कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी अन्य के प्रति भक्ति या उपासना करने का कोई स्थान नहीं है. आजादी के लिए लड़ रही कांग्रेस पर दबाव बढ़ गया था. एक तरफ वंदे मातरम् हिन्दू आंदोलनकारियों में जोश भर रहा था. वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस मुस्लिम लीग से उलझकर अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को सुस्त नहीं पड़ने देना चाहती थी. इसलिए कांग्रेस ने इस विवाद का हल निकालने के लिए कमेटी बनाई.

विवाद का क्या हल निकला?

कमेटी में रवींद्र नाथ टैगोर, नेहरू, अबुल कलाम आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस को शामिल किया गया. कमेटी ने 1937 में बीच का रास्ता निकाला. तय किया गया गया कि इस गीत के शुरू के दो पद्य गाए जाएंगे जिनमें कोई धार्मिक पहलू नहीं है. 1938 के हरीपुरा कांग्रेस अधिवेशन में ऐसा ही किया गया, लेकिन इससे न तो गीत के समर्थक खुश थे और न विरोधी.

Vande Mataram Debate In Lok Sabha Which Word Make It Controversial Hindi Muslim Split (1)

जिन्ना ने गीत को त्यागने के लिए पत्र लिखा

मामला बढ़ने पर जिन्ना ने पंडित नेहरू को 17 मार्च, 1938 को एक पत्र लिखा. पत्र में वंदे मातरम् को त्यागने की बात लिखी. जिन्ना का तर्क था कि जिस ‘आनंद मठ’ किताब से यह गीत लिया गया है वह मुस्लिम विरोधी है. बंकिम के साहित्य पर काम करने वालों ने जिन्ना की बात को खारिज किया. तर्क दिया कि साहित्य में कहीं भी मुस्लिमों का विरोध नहीं किया गया है.

समिति ने पाया था कि इस गीत के पहले के दो पैरा मातृ भूमि की प्रशंसा में हैं, गीत में उसके आगे हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र किया गया है. इसीलिए दो पैरा को ही मान्यता दी गई ताकि किसी की भावना आहत न हो. अंत में 24 जनवरी 1950 को इसे राष्ट्र गीत के रूप में मंजूर किया. अब इस गीत के 150 साल पूरे होने पर फिर से इसकी चर्चा हो रही है.

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