मध्य प्रदेश

ग्वालियर के कृषि विश्वविद्यालय ने 620 जिलों में की रिसर्च…कमजोर हो रही है देश की मिट्टी, घटा उपजाऊपन !!

ग्वालियर के कृषि विश्वविद्यालय ने 620 जिलों में की रिसर्च
ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा घटना चिंताजनक; कमजोर हो रही है देश की मिट्टी, घटा उपजाऊपन

देश की मिट्टी कमजोर हो रही है और मिट्टी की इस कमजोरी का कारण है तेजी से मिट्टी में घटता जा रहा आर्गेनिक कार्बन। जिसकी वजह से खेती उपजाऊपन तो कम हो ही रहा है। साथ ही इसका बड़ा असर मिट्टी की उर्वर क्षमता पर भी पड़ रहा है।

यह बात ग्वालियर के राजमाता विजयराजे कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरू प्रोफेसर अरविंद शुक्ला और उनकी टीम के द्वारा देश भर के 620 जिलों के ढाई लाख सैंपल पर की गई रिसर्च में निकल सामने आई है। प्रो. शुक्ला की माने तो यह खेती के लिहाज से बड़ी चिंता का विषय है। क्योंकि देश की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बेहद कम होती जा रही है।

क्या है आर्गेनिक कार्बन, क्यों है जरूरी

किसानों को अक्सर लगता है कि ज्यादा रासायनिक खाद डालने से फसल बेहतर होगी, लेकिन वास्तविकता बिल्कुल उलट है। असंतुलित उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और कार्बन पदार्थ तेजी से घट रहा है।

मिट्टी में मौजूद ऑर्गेनिक कार्बन को जीवांश पदार्थ भी कहा जाता है, क्योंकि यह पौधों के अवशेष, पशुओं के गोबर और वनस्पति सामग्री के विघटन से बनता है।

प्रो. शुक्ला बताते हैं कि अच्छी मिट्टी में 5% ऑर्गेनिक कार्बन होना चाहिए, लेकिन कृषि योग्य जमीनों के लिए 0.75% को न्यूनतम सीमा माना जाता है। चिंताजनक बात यह है कि भारत की अधिकांश मिट्टी में यह मूल्य 0.5% से भी कम पाया गया है।

ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी में जल धारण क्षमता को बढ़ाता है, पोषक तत्वों को सुरक्षित रखता है और उन्हें पौधों की जड़ों तक पहुंचाता है। इसे शरीर में खून की तरह समझा जा सकता है कि खून कम होगा तो शरीर कमजोर, और कार्बन पदार्थ कम होगा तो फसल कमजोर।

अच्छी मिट्टी में 5% ऑर्गेनिक कार्बन होना चाहिए।
अच्छी मिट्टी में 5% ऑर्गेनिक कार्बन होना चाहिए।

क्यों आ रही कमी शोध में पाया गया कि मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन कम होने के कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख रूप से गलत तरीकों से खेती करना, आवश्यकता से अधिक जुताई करना। पराली या अन्य फसलों के अवशेषों को खेतों में ही जला देना भी मिट्टी को सख्त बनाकर उसे कमजोर कर रहा है।

इसके अलावा जलवायु परिवर्तन भी मिट्टी को कमजोर करने का बड़ा कारण बन रहा है। क्योंकि अत्यधिक गर्मी बढ़ने के कारण मिट्टी से जल का अवशोषण अधिक होता है और मिट्टी की ऊपरी सतह में मौजूद कार्बन जलने लगता है।

इतना ही नहीं कई बार अत्यधिक बारिश और पेड़ो की घटती संख्या के चलते बारिश का पानी भी कार्बन पदार्थ को बहा ले जाता है। रासायनिक खादों का अधिक प्रयोग भी कार्बन के कम होने का बड़ा कारण है।

किन क्षेत्रों में स्थिति सबसे खराब

प्रो. शुक्ला ने बताया कि देश के कुछ पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों को छोड़कर ज्यादातर इलाकों में स्थिति खराब है। विशेष रूप से राजस्थान कई जिलों में कार्बन 0.25% से भी कम पाया गया है। वहीं, मध्यप्रदेश का ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक है यहां मिट्टी में कार्बन 0.2% से 0.3% तक ही पाया गया है। और गुजरात का मोरबी क्षेत्र 0.25% से कम है। उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में भी अधिकांश मिट्टी में कार्बन पदार्थ कम पाया गया।

सभी पर पड़ेगा असर

कार्बन पदार्थ की कमी का सबसे बड़ा नुकसान किसानों और उनके उत्पादन को हो रहा है। जिसकी वजह से फसल की उपज कम होती जा रही है। पानी और खाद की मांग बढ़ जाती है। और इसके परिणाम लागत बढ़ने से आर्थिक नुकसान हो जाता है। इसके अलावा पोषक तत्व कम मिलने से इंसानों के भोजन में भी पोषण की कमी होने लगती है।

सुधारी जा सकती है स्थिति

कुलपति प्रो शुक्ला ने बताया कि हालात जो भी हैं उन्हें सुधारा भी जा सकता है। इसके लिए खेती के तरीकों में कुछ बदलाव करने की आवश्यकता है। जैसे खेत में फसल अवशेष (पराली) जलाने की बजाय उसे मिट्टी में मिलाएं।

इससे कार्बन की मात्रा को बढ़ने में सहयोग मिलेगा। खेतों में गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद जैसे जैविक खादों का उपयोग करें। फसल चक्र और बहू फसलीय खेती अपनाएं। कम से कम या जितनी आवश्यकता हो उतनी ही जुताई करें। अधिक से अधिक पेड़ भी लगाएं। जो मिट्टी को बांधे रखने में सहयोग करेंगे।

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