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देश का सबसे बड़ा नवग्रह मंदिर तैयार !!!!

देश का सबसे बड़ा नवग्रह मंदिर तैयार…
12 एकड़ जमीन पर सिर्फ मंदिर बना, 3 मंजिलों पर पत्नियों संग विराजेंगे नवग्रह; फरवरी में प्राण-प्रतिष्ठा

शिया का सबसे बड़ा और अद्भुत नवग्रह मंदिर ग्वालियर के डबरा में बना है। इसे अद्भुत इसलिए कहा जा रहा है कि एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां नवग्रह के साथ उनकी पत्नियां भी विराजमान हैं। 12 एकड़ जमीन पर सिर्फ मंदिर बना है।

यह मंदिर सनातन धर्म परंपरा, वास्तु शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र आधार पर 108 खंभों पर स्थापित किया है। हिंदू धर्म में 108 अंक का विशेष महत्व है। 27 तारामंडल, जिनको नक्षत्र भी कहा जाता है। हर नक्षत्र की चार-चार दिशाएं होती हैं, जिनका योग 108 होता है।

मंदिर में नवग्रह की स्थापना बहुत अध्ययन के बाद की गई है। हर मंदिर और ग्रह को ऐसे स्थान दिया है कि कभी वह एक-दूसरे के सामने न आ सके। सूर्य मंदिर की स्थापना के साथ उनके तेज को नियंत्रित करने पानी का तालाब, नालियां व झरोखे बनाए गए हैं।

मंदिर के साथ ही पर्यटन नक्शे पर ग्वालियर का डबरा उभरा आया है। ग्वालियर से ओरछा जाने वाले डबरा में नवग्रह मंदिर, दतिया पीतांबरा पीठ फिर ओरछा जाएंगे। अगले महीने 11 से 20 फरवरी के बीच मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा है। जानिए क्या हैं मंदिर की खासियत…

रात में जगमग रोशनी में नया एशिया का सबसे बड़ा व अद्भुत नवग्रह मंदिर
रात में जगमग रोशनी में नया एशिया का सबसे बड़ा व अद्भुत नवग्रह मंदिर

ब्रह्मांड का स्वरूप है 108, इतने ही मंदिर के पिलर

वैदिक धर्म ग्रंथों एवं शास्त्रों में बताया गया है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में कुल 27 तारामंडल हैं। इन तारामंडलों की चार दिशाएं हैं। यदि हम 27 को 4 से गुणा करते हैं, तो कुल 108 संख्या आती है।जिसका अर्थ यह है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वरूप 108 अंक है।

108 को हर्षद संख्या माना जाता है, जो अपने अंकों के योग से विभाज्य एक पूर्णांक है। संस्कृत में हर्षद का अर्थ है ‘महान् आनंद’। 108 प्रतिच्छेदित (Intersected) ऊर्जा रेखाएं हैं, जो मिलकर हृदय चक्र बनाती हैं। इसी सोच के साथ 12 एकड़ में 108 पिलरों पर यह मंदिर स्थापित है।

3 तलों पर अलग-अलग ग्रहों का मंदिर

मंदिर के भू-तल पर 8 वाहों (ग्रहों) की मार्बल की अलग-अलग प्रतिमाएं हैं। प्रथम तल पर, जहां मुख्य वाह सूर्य देव की अष्टधातु की प्रतिमा उनकी दो पत्नियों के साथ है। इसके प्रवेश द्वार पर 7 अश्व सफेद मार्बल से बनाए गए हैं।

इसी तर्ज पर आठ वाह अपनी पत्नियों के साथ विराजित हैं। ये सभी प्रतिमाएं अष्टधातु की अलग-अलग रंगों की हैं। साथ ही अलग-अलग ग्रहों के मंदिरों के द्वार पर मंत्र भी लिखे गए हैं। जबकि द्वितीय तल पर वाहों के देवताओं को भी विराजित किया गया है।

इस तरह भव्य परिसर में इन तीनों तलों पर अलग-अलग ग्रहों के अलग-अलग मंदिर स्थापित हैं। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि वाहों की दृष्टि एक-दूसरे पर न पड़े। साथ ही सभी ग्रहों को उसी रंग में बनाया गया है, जैसा उनका वास्तविक रंग है।

नवग्रह मंदिर का यह प्रवेश द्वार है।
नवग्रह मंदिर का यह प्रवेश द्वार है।

सूर्य के तेज को नियंत्रित करने बनाई जल परिक्रमा

मंदिर का निर्माण जितने क्षेत्रफल में किया गया है, ठीक उतने ही क्षेत्रफल में सरोवर भी बनाया गया है। सरोवर का जल मंदिर की परिक्रमा करते हुए वापस सरोवर में पहुंचेगा। इसके पीछे का तर्क भी ज्योतिष के अनुसार लिया गया है, क्योंकि जब सूर्य देव को पृथ्वी पर विराजित किया जाता है, तो उनके तेज या ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है।

माना गया है कि जल ही सूर्य की ऊर्जा को नियंत्रित करता है। इसका उदाहरण ग्वालियर शहर में एक सूर्य मंदिर है, जिसे बिड़ला समूह ने बनाया था। उसके बाद ग्वालियर की जेसी मिल बंद हो गई थी, जिससे आर्थिक व सामाजिक तौर पर ग्वालियर को काफी नुकसान हुआ था। ऐसा माना जाता है कि सूर्य मंदिर पर जल का इंतजाम नहीं होने का यह असर था।

सूर्य के तेज को कम करने के लिए तालाब का बनवाया गया है।
सूर्य के तेज को कम करने के लिए तालाब का बनवाया गया है।

द्रविड़ शैली में बना है मंदिर

मंदिर के आर्किटेक्ट और डिजाइन करने वाले इंजीनियर अनिल शर्मा ने बताया कि मंदिर द्रविड़ शैली में बनाया गया है। द्रविड़ शैली दक्षिण भारतीय हिंदू स्थापत्य कला की एक शैली है। यह दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड़ शैली कहलाती है।

तमिलनाडु व निकटवर्ती क्षेत्रों के अधिकांश मंदिर इसी श्रेणी के होते हैं। इसमें मंदिर का आधार भाग वर्गाकार होता है तथा गर्भगृह के ऊपर का शिखर भाग प्रिज्मवत् या पिरामिडनुमा होता है, जिसमें क्षैतिज विभाजन लिए अनेक मंजिलें होती हैं।

शिखर के शीर्ष भाग पर आमलक व कलश की जगह स्तूपिका होती हैं। इस शैली के मंदिरों की प्रमुख विशेषता यह है कि ये काफी ऊंचे तथा विशाल प्रांगण से घिरे होते हैं। प्रांगण में छोटे-बड़े अनेक मंदिर, कक्ष तथा जलकुंड होते हैं।

परिसर में कल्याणी या पुष्करिणी के रूप में जलाशय होता है। प्रांगण का मुख्य प्रवेश द्वार गोपुरम कहलाता है। प्रायः मंदिर प्रांगण में विशाल दीप स्तंभ व ध्वज स्तंभ का भी विधान होता है।

सभी नौ ग्रहों के मंदिर एक साथ ऐसे बने हैं कि एक ग्रह की दृष्टि दूसरे पर न पड़े।
सभी नौ ग्रहों के मंदिर एक साथ ऐसे बने हैं कि एक ग्रह की दृष्टि दूसरे पर न पड़े।

9 हजार वर्ग फीट में नक्षत्र वन रहेगा खास

ग्वालियर के डबरा में बनकर तैयार अद्भुत नवग्रह मंदिर में 9 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में नक्षत्र वन तैयार किया गया है, जिसमें प्रत्येक वृक्ष की परिक्रमा की व्यवस्था है। यह परिक्रमा ही अपने आप में पूरी नवग्रह पूजा है। आधे कष्ट इसकी परिक्रमा मात्र से दूर हो जाएंगे।

काशी के कलाकारों ने दिया प्रतिमाओं को आकार

एशिया के सबसे बड़े नवग्रह मंदिर में नवग्रह, सभी ग्रहों की पत्नियां व उनके आदि देव की मूर्तियों का निर्माण उत्तर प्रदेश के काशी (बनारस) से आए कलाकारों (कारीगरों) ने किया है। मूर्ति बनाने वाले संजय कुमार ने बताया कि लगभग 400 कारीगरों ने ढाई साल में दिन-रात मेहनत कर इन मूर्तियों को आकार दिया है।

उनका कहना है कि सभी प्रतिमाएं अष्टधातु की हैं, जबकि मूर्तियां सफेद मार्बल की हैं। मार्बल की मूर्तियों को राजस्थान, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से आए कारीगरों ने मूर्त रूप दिया है। मेरी टीम ने बारीकी से इन मूर्तियों और प्रतिमाओं को आकार दिया है, जिससे कहीं भी कोई चूक न हो।

 

सभी ग्रहों की शांति के लिए एक ही स्थान पर पूजा-पाठ मंदिर का निर्माण परशुराम लोक न्यास द्वारा किया जा रहा है। मंदिर के संरक्षक व पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा के बड़े भाई डॉ. श्रीमन नारायण मिश्रा का कहना है कि निर्माण वास्तुकला, ज्योतिष व विज्ञान को ध्यान में रखकर कराया है। यह मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश का पहला ऐसा पीठ होगा, जिसमें लोग एक साथ सभी ग्रहों की शांति के लिए पूजा-पाठ करेंगे।

इस मंदिर को बनाने का विचार इसलिए आया, क्योंकि अभी तक हर ग्रह के अलग-अलग मंदिर हैं। लोगों को अलग-अलग जगह जाना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां सभी ग्रह अपनी पत्नियों के साथ विराजमान हैं।

मंदिर ट्रस्ट से जुड़े डॉ. श्रीमन नारायण मिश्रा ने बताया-

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2010 में मेरी माता जी की इच्छानुसार इसी परिसर में महालक्ष्मी मंदिर स्थापित किया था। इसके बाद छोटे भाई डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने नवग्रह मंदिर स्थापित करने का निर्णय लिया। कुछ वर्ष पूर्व NASA के वैज्ञानिक भी यहां आकर मंदिर देख चुके हैं। वे भी हैरान रह गए। मंदिर में नवग्रहों को पत्नियों के साथ स्थापित करने का विचार प्रसिद्ध संत दाती महाराज ने दिया था।

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अभी से मंदिरों में लोगों की आवाजाही शुरू हो गई है।
अभी से मंदिरों में लोगों की आवाजाही शुरू हो गई है।

11 से 19 फरवरी तक कथा-कविता के आयोजन

मंदिर की की 11 से 20 फरवरी तक प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। इस दौरान 11 से 13 फरवरी तक पं. प्रदीप मिश्रा की कथा होगी। 14 से 16 फरवरी तक कवि कुमार विश्वास का कार्यक्रम होगा। 17 से 19 फरवरी तक बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा होगी।

20 फरवरी को नवग्रह पीठ पर एक भंडारे के साथ महोत्सव का समापन होगा। मंदिर परिसर में 9 मंजिला यज्ञशाला भी बनाई है। जहां प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दी जाएंगी।

नवग्रह मंदिर से पर्यटन के क्षेत्र में उभरेगा डबरा

एशिया का सबसे बड़ा व अद्भुत नवग्रह मंदिर बनने के साथ ही ग्वालियर का डबरा अब पर्यटन के मानचित्र पर भी नजर आने लगा है। ग्वालियर से ओरछा जाने वाले टूरिस्ट अभी तक दतिया, झांसी होकर ओरछा निकल जाते थे, लेकिन अब नवग्रह मंदिर देखने डबरा आना शुरू हो गए हैं। मंदिर की अभी प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई है, लेकिन हजारों लोग हर दिन मंदिर पहुंच रहे हैं।

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