स्वाभिमान पर्व पर असफलता का धब्बा !
स्वाभिमान पर्व पर असफलता का धब्बा
भारत जिस समय सोमनाथ मंदिर पर हमले की 1000 वी साल को स्वाभिमान पर्व के रूप में मना रहा है उसी समय इसरो का पी एस एल वी -C62 मिशन 12 जनवरी 2026 को नाकाम हो गया. चार स्टेज का रॉकेट 90 प्रतिशत सही काम करता है, फिर नाकाम हो जाता है. तीसरे स्टेज में रोल रेट डिस्टर्बेंस और फ्लाइट पाथ डिस्टर्ब होने के कारण 16 सैटेलाइट्स (अन्वेषा सहित) सही ऑर्बिट में नहीं पहुंचे. यह लगातार दूसरी असफलता (C61 के बाद) है, जिससे ,इसरो डीआरडीओ और एन एस आई एल और देश को 500-800 करोड़ रुपये का वित्तीय व इज्जत को बड़ा झटका लगा है.
मै इस नाकामी को इसरो की या किसी देवी देवता की नाकामी नहीं मानता. मेरे हिसाब से ये सरकार की प्राथमिकताओं की नाकामी है. सरकार का पूरा ध्यान विज्ञान के बजाय धर्मांधता बढाने पर लगा हुआ है. सरकार त्रिपुंड लगाकर डमरू बजाती घूम रही है उधर इसरो की नाकामी से दुनिया में भारत की बदनामी का डमरू बज गया.
आपको पता है किभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो के लिए बीता दिन बेहद दुखद रहा. पीएस एलवी-C62 मिशन, जो 2026 की पहली लॉन्चिंग थी, सफल नहीं हो सकी. रॉकेट ने सुबह 10:18 बजे लिफ्टऑफ तो किया, लेकिन तीसरे स्टेज (PS3) के अंत में गंभीर समस्या आई. फ्लाइट पाथ में बदलाव और रोल रेट में डिस्टर्बेंस हुआ, जिससे रॉकेट जरूरी स्पीड हासिल नहीं कर पाया.
नतीजा – मुख्य पेलोड डीआरडीओ का EOS-N1 (अन्वेषा) सैटेलाइट और 15 अन्य सह-यात्री सैटेलाइट्स (कुल 16) सही ऑर्बिट में नहीं पहुंच पाए. ये सभी सैटेलाइट्स अब अंतरिक्ष में खो चुके हैं या वायुमंडल में जलकर नष्ट हो गए हैं. पूजापाठी, सनातनी इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन ने कहा कि तीसरे स्टेज के अंत में वाहन का प्रदर्शन सामान्य था, लेकिन उसके बाद रोल रेट में गड़बड़ी और फ्लाइट पाथ में बदलाव देखा गया. हम डेटा का विस्तृत विश्लेषण कर रहे हैं.
दुख की बात है कि हमेशा भगवान भरोसे हर काम रने वाली हमारी सरकार ने इस नाकामी की जिम्मेदारी उठाने की जहमत नहीं उठाई. जबकि किसी न किसी को तो इस नाकामी के लिए अपने कंधे सामने लाना चाहिए थे. लेकिन सब तो स्वाभिमान पर्व मनाने में लगे हैं. फुर्सत किसे है इसरो की तरफ देखने की. इसरो ईसीआई की तरह वोट तो दिलाता नहीं है.
दर असल ये मिशन केवल इसरो के लिए ही नहीं अपितु देश, डीआरडीओ, एन एस आई एल (न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड) और सैन्य बलों के लिए भी बड़ा झटका है.इस झटके को देश ऐसे सह रहा है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. आपको बता दूं कि पीएस एलवी लॉन्च की लागत करीब 250-300 करोड़ रुपये होती है.मुख्य सैटेलाइट अन्वेषा (EOS-N1) डीआरडीओ का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट था, जिसकी लागत 200-400 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है.15 सह-यात्री सैटेलाइट्स (भारतीय स्टार्टअप्स, नेपाल, स्पेन आदि) की कुल लागत 100-200 करोड़ रुपये आती है. इस तरह कुल नुकसान: 500-800 करोड़ रुपये से ज्यादा का होता है.
आर्थिक नुकसान तो माना देश झेल भी लेगा किंतु. लगातार दो असफलताओं से विश्वास डगमगा सकता है. कॉमर्शियल लॉन्च एन एस आई एल के लिए विदेशी ग्राहक सोचेंगे? डीआरडीओ का अन्वेषा सैटेलाइट रक्षा के लिए महत्वपूर्ण था – सीमा निगरानी, छिपे लक्ष्यों की पहचान. इसका नुकसान सैन्य खुफिया क्षमता पर असर डालेगा. इस ननाकामी से आर्बिट एड का आयुलसेट स्टार्टअप्स और यूनिवर्सिटीज के सैटेलाइट्स खोने से प्राइवेट स्पेस सेक्टर का भरोसा टूट सकता है.
तीसरे स्टेज में दूसरी बार लगातार यह समस्या आई है. इससे पहले (मई 2025 में भी PSLV-C61 तीसरे स्टेज में चैंबर प्रेशर गिरने से EOS-09 सैटेलाइट खो गया था. उस मिशन के बाद ISRO ने PSLV फ्लीट को ग्राउंड किया, रिव्यू किया और सुधार किए लेकिन फिर भी समस्या बनी रही. ISRO अब फेलियर एनालिसिस कमिटी बनाकर जांच कर रही है.
आपको पता है कि इसरो का स्वाभिमान पीएमओ यानि सेवातीर्थ से जुडा है.इसरो ने इस मुसलसल नाकामी को एक कमजोरी बताया, लेकिन पूरी रिपोर्ट नहीं दी. इसरो की परंपरा है कि कामयाबी या नाकामी की रिपोर्ट्स को पहले पीएमओ यानि सेवातीर्थ को सौंपा जाता है, फिर जरूरत पड़ने पर सार्वजनिक किया जाता है. उल्लेखनीय है कि पीएस एलवी -C61 के बाद सुधार किए गए, लेकिन C62 में भी तीसरे स्टेज की समस्या दोहराई गई, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं. लेकिन हमेशा की तरह देश को किसी सवाल का जबाब नहीं मिलेगा. सवाल करना देशद्रोही होना और जबाब न देना ही आज के दौर की राष्ट्रभक्ति है

