पुलिस, डॉक्टर, नगर निगम सभी गो-तस्कर के आगे सरेंडर…असलम चमड़ा से पूछताछ से डर गए अफसर !!
राजधानी भोपाल के सरकारी स्लॉटर हाऊस के ट्रक से गोमांस पकड़े जाने के बाद नगर निगम और पुलिस ने भले ही मामले की जांच शुरू कर दी है। लापरवाही बरतने वाले अफसरों को सस्पेंड कर दिया हो, लेकिन इस पूरे मामले में नगर निगम, पुलिस और डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि मंत्रालय से महज 2 किलोमीटर दूर स्लॉटर हाउस में 260 से ज्यादा गायें काट दी गईं और इसकी सिस्टम को कानों कान भनक तक नहीं लगी। हिंदू संगठनों के विरोध की वजह से ये मामला सामने आया तो प्रशासन ने मामले को दबाने और रफा दफा करने की हर तरह से कोशिश की। हिंदू संगठनों का ये भी आरोप है कि जैसी कार्रवाई सरकार की तरफ होना चाहिए थी वैसी नहीं हुई।
बता दें कि एक महीने पहले ही स्लॉटर हाउस के संचालन को नगर निगम ने मंजूरी दी थी। इसके संचालन का जिम्मा लाइव स्टॉक फूड प्रोसेसर लिमिटेड के असलम कुरैशी को सौंपा गया था। आखिर इस पूरे मामले में किस किस तरह से लापरवाही बरती गई? गो तस्कर के आगे कैसे नगर निगम और पुलिस के अफसर सरेंडर हो गए और असलम चमड़ा से पूछताछ क्यों नहीं हुई? किस जिम्मेदारी की क्या भूमिका रही?
पढ़िए पूरी स्टोरी…
गो रक्षा वर्ष में हुआ गायों का कत्ल
7 जनवरी को जब मथुरा लेबोरेटरी से रिपोर्ट आई तो सब सन्न रह गए। जिन पैकेट्स के सैंपल लिए गए, उसमें गोमांस होने की पुष्टि हुई। ये इसलिए अहम था क्योंकि 2004 से मध्य प्रदेश में गोवध प्रतिबंधित है। गो हत्या पर देश में सबसे सख्त कानून भी एमपी में ही है। मध्य प्रदेश में 2024–25 को गो–रक्षा वर्ष घोषित किया गया था।
बीजेपी सरकार का पूरा सरकारी सिस्टम इस मामले को दबाने में लग गया। यानी पिछ 12 बजकर 49 बजे जहांगीराबाद थाने में एफआईआर दर्ज हुई। एफआईआर के बाद पुलिस ने स्लॉटर हाउस के संचालक असलम चमड़ा और कंटेनर के ड्राइवर शोएब को गिरफ्तार कर सीधे जेल भेज दिया। वो भी बिना कोई कोई पूछताछ किए।
ये सब इतना गुपचुप हुआ कि उस ट्रक को रोककर गोमांस होने का आरोप लगाने वालों को कानोंकान भनक तक नहीं लगी।
सिस्टम की मिलीभगत कैसे हुआ इतना बड़ा खेल?
यह गोरखधंधा किसी एक व्यक्ति या विभाग की लापरवाही का नतीजा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित अपराध की तरफ इशारा करता है, जिसमें कई सरकारी विभाग सवालों के घेरे में हैं।

100 करोड़ की जमीन 20 लाख रुपए सालाना की लीज पर
स्लॉटर हाउस के संचालन का पूरा खेल नगर निगम की मेहरबानी से चल रहा था। नगर निगम ने इस स्लॉटर हाउस के संचालन का जिम्मा असलम कुरैशी उर्फ ‘असलम चमड़ा’ की कंपनी ‘लाइव स्टॉक फूड प्रोसेसर’ को दिया था। सूत्रों के मुताबिक, करीब 100 करोड़ रुपए की बेशकीमती जमीन असलम को महज 20 लाख रुपए सालाना की लीज पर 20 साल के लिए दे दी गई।
निगम परिषद के अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी का आरोप है कि परिषद को अंधेरे में रखकर मेयर मालती राय ने संचालन का काम असलम को सौंप दिया। जब यह फाइल निगम कमिश्नर संस्कृति जैन के पास पहुंची, तो उन्होंने भी 26 घंटे के भीतर इसे मंजूरी दे दी।
वहीं मेयर मालती राय का कहना है कि स्लॉटर हाउस को बनाने में पैसा भी असलम की कंपनी ने ही लगाया था। निगम के पशु चिकित्सक डॉ. बी.एस. गौर ने स्लॉटर हाउस में भैंस काटने की अनुमति दी, लेकिन यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि वहां भैंस कट रही है या गाय।
क्या एक्शन लिया: मामला सामने आने के बाद, डॉ. गौर सहित 9 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया और स्लॉटर हाउस को सील कर दिया गया।
स्लॉटर के कारोबार का किंग बना असलम
असलम की इसी कंपनी को शहर में मृत पशुओं के निष्पादन का भी काम मिल गया था। स्लॉटर हाउस और मृत पशुओं के वेस्ट मटेरियल से असलम ने रेंडरिंग प्लांट शुरू कर दिया। इससे मुर्गी के दाने बनाने का एक नया कारोबार शुरू हो गया। उधर, असलम के पास पहले से ही वन विहार में मांस सप्लाई का भी ठेका था। असलम अपने प्रभाव से स्लॉटर के कारोबार का किंग बन चुका था।

इंटेलिजेंस फेल या जानबूझकर अनदेखी?
इस पूरे मामले में भोपाल पुलिस की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध है। शहर के बीचों-बीच 260 से ज्यादा गायें लाई गईं और काटी गईं, लेकिन पुलिस और उसके खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह एक बड़ी विफलता है। रिपोर्ट आने के बाद, पुलिस ने बेहद गुपचुप तरीके से जहांगीराबाद थाने में एफआईआर दर्ज की।
मुख्य आरोपी असलम चमड़ा और ड्राइवर शोएब को गिरफ्तार कर बिना किसी पूछताछ या रिमांड के सीधे जेल भेज दिया गया। जिस दिन कंटेनर पकड़ा गया, उस दिन पुलिस ने स्लॉटर हाउस के सीसीटीवी फुटेज क्यों नहीं जब्त किए? क्या उन्हें छिपाने की कोशिश की जा रही है? सवाल जस का तस है कि मुख्य आरोपियों से पूछताछ क्यों नहीं की गई?
क्या कार्रवाई हुई: चौतरफा दबाव के बाद मामले की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया है।

पशु चिकित्सकों ने की सच छिपाने की कोशिश
मौके पर पहुंचे पशु चिकित्सकों ने भी अपनी भूमिका को संदिग्ध बना दिया। तीन डॉक्टरों की टीम ने मांस को भैंस का बताया, जिससे तस्करों को कंटेनर छुड़ाने का मौका मिल गया। डॉक्टरों का तर्क है कि मथुरा से आई रिपोर्ट केवल कैरोटीन जांच है, जो कोर्ट में टिक नहीं सकती। सटीक परिणाम के लिए डीएनए जांच जरूरी है, जो अब तक नहीं कराई गई।
यह सवाल उठता है कि प्रशासन डीएनए जांच से क्यों बच रहा है? इस पूरे खेल का सबसे बड़ा सबूत स्लॉटर हाउस के केलकुलेशन में छिपा है। स्लॉटर हाउस को 85 भैंस काटने की अनुमति थी। एक भैंस से औसतन 1 से 1.5 क्विंटल (100-150 किलो) मांस निकलता है। इस हिसाब से 85 भैंसों से अधिकतम 127.5 क्विंटल (12.75 टन) मांस निकल सकता था।
कंटेनर में 26.5 टन (265 क्विंटल) मांस मिला, जो कि अनुमति से दोगुने से भी ज्यादा था। संस्कृति बचाओ मंच के चंद्रशेखर तिवारी कहते हैं, यह आठवीं बार है जब हमने गो-मांस पकड़ा है। हमारा सूचना तंत्र इतना मजबूत है, तो प्रशासन को खबर क्यों नहीं लगती?
इन सवालों का जवाब अभी भी नहीं मिला
- 26.5 टन गो-मांस के लिए काटी गईं 260 से ज्यादा गायें कहां से लाई गईं?
- क्या गायों को इसी स्लॉटर हाउस में काटा गया? यदि हां, तो फॉरेंसिक टीम ने वहां से सबूत क्यों नहीं जुटाए?
- पुलिस ने मुख्य आरोपी असलम चमड़ा से पूछताछ क्यों नहीं की, ताकि इस तस्करी के पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सके?
- स्लॉटर हाउस के सीसीटीवी फुटेज में क्या है और उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
- किसके कहने पर 7 करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत का गो-मांस रिपोर्ट आने से पहले ही छोड़ दिया गया?

