नई दिल्ली। यह नया दौर है। अब सोशल मीडिया के दौर में लोग भूल जाना चाहेंगे। ऑनलाइन कई तरह के बदनाम करने वाले कंटेंट बनाए जा रहे हैं।

दिलचस्प मामला है.. यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को इस बात पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया कि क्या भुलाए जाने का अधिकार ऑनलाइन न्यूज पर लागू किया जा सकता है।

साथ ही कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत प्रेस की आजादी के अधिकारों और अनुच्छेद-21 के तहत किसी व्यक्ति के सम्मान, निजता और भुलाए जाने के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ‘भुलाए जाने के अधिकार’ पर करेगा सुनवाई

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने एक मीडिया हाउस की उस याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें उस आरोपित से जुड़ी खबरों के प्रसारण एवं प्रकाशन पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था, जिसे एक आपराधिक मामले में आरोपमुक्त कर दिया गया है।

हाई कोर्ट ने 18 दिसंबर, 2025 को मीडिया संस्थानों को उक्त व्यक्ति से जुड़ी खबरें हटाने का निर्देश दिया था, साथ ही मानहानि के मुकदमे में ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी रोक के आदेश को भी बरकरार रखा था।

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को मीडिया हाउस ने चुनौती दी

सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति को नोटिस जारी किया है, जिसने भुला दिए जाने के निर्देश का अनुरोध किया है। साथ ही अन्य मीडिया संस्थानों से भी 16 मार्च तक जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 18 दिसंबर के दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को मिसाल नहीं माना जाएगा, हालांकि मानहानि की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

हाई कोर्ट के निर्देश को चुनौती देने वाले मीडिया हाउस के वकील अरविंद दातार ने कहा कि भुलाए जाने का अधिकार (राइट टू बी फॉरगाटन) आनलाइन खबरों पर लागू नहीं किया जा सकता।

भुलाए जाने का अधिकार, वह डिजिटल अधिकार है जो किसी व्यक्ति को इंटरनेट, सर्च इंजन या डाटाबेस से अपनी पुरानी, अप्रासंगिक या संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी या रिकार्ड को हटाने की मांग करने की अनुमति देता है।