शहरीकरण की कीमत चुका रहा है देहरादून!
शहरीकरण की कीमत चुका रहा है देहरादून! बढ़ती गर्मी का क्या कारण? वैज्ञानिकों ने किया बड़ा दावा
Dehradun Weather: देहरादून में पिछले कुछ दशकों में शहर की फिजा में आया बदलाव सिर्फ महसूस ही नहीं किया जा रहा, बल्कि अब इसे वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ समझा जा सकता है.
देहरादून में पिछले कुछ दशकों में शहर की फिजा में आया बदलाव सिर्फ महसूस ही नहीं किया जा रहा, बल्कि अब इसे वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ समझा जा सकता है. दून विश्वविद्यालय और नेशनल एटमॉस्फेरिक रिसर्च लेबोरेटरी द्वारा मिलकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया गया है जो इस बदलाव की पुष्टि करता है. इस शोध में देहरादून और मसूरी दोनों शहरों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है, जिसके नतीजे बेहद दिलचस्प और चिंताजनक दोनों हैं.
अध्ययन से पता चला है कि देहरादून में बढ़ता तापमान सीधे तौर पर शहरीकरण की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. पहले जहां कभी हरे-भरे बाग-बगीचे और हुआ करते खेत थे, वहां अब कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए हैं. सड़कें चौड़ी हुई हैं, इमारतें ऊंची उठी हैं और शहर का विस्तार हुआ है. यही शहरीकरण देहरादून के मौसम और तापमान को प्रभावित कर रहा है. हालांकि, मसूरी में भी बीते कुछ वर्षों में शहरीकरण हुआ लेकिन अभी तक तापमान में कोई खास बदलाव नहीं देखे गए.
देहरादून और मसूरी के तापमान में अंतर क्योंदून विवि के एनवायरमेंट एंड नेचुरल रिसोर्स विभाग ने यह समझने का फैसला किया कि गर्मी के मौसम में, खासकर मानसून आने से पहले के महीनों में, शहरी संरचनाएं तापमान को किस तरह प्रभावित करती हैं. विभाग के डॉ. उज्ज्वल के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया.
शोधकर्ताओं ने डब्लूआरएफ मॉडल का उपयोग करते हुए देहरादून और मसूरी की तुलना की. देहरादून समुद्र तल से लगभग 640 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जबकि मसूरी करीब 2005 मीटर की ऊंचाई पर बसा हुआ है. इस ऊंचाई के अंतर के बावजूद, दोनों शहरों में शहरीकरण का असर अलग-अलग तरीके से दिख रहा है.
अध्ययन के लिए अप्रैल से जून का चुना गया समयअध्ययन के लिए अप्रैल, मई और जून का समय चुना गया, जो साल का सबसे गर्म दौर होता है. शोधकर्ताओं ने मॉडल के जरिए दो अलग-अलग परिदृश्य तैयार किए. पहले परिदृश्य में उन्होंने प्राकृतिक स्थिति को देखा, जहां खेती की जमीन है, जंगल हैं, हवा का प्रवाह स्वाभाविक है और सूरज की रोशनी सतह पर सीधे पड़ती है. इसमें जमीन की सतह का तापमान और वातावरण के तापमान को मापा गया. दूसरे परिदृश्य में शहरी संरचनाओं के साथ तापमान का आकलन किया गया, जहां इमारतें हैं, सड़कें हैं, कंक्रीट के विशाल क्षेत्र हैं और प्राकृतिक हरियाली की जगह पक्की निर्माण सामग्री ने ले ली है.
शहरी संरचनाएं तापमान को कर रहीं प्रभावितदेहरादून के मामले में नतीजे साफ तौर पर दिखाते हैं कि शहरी संरचनाएं तापमान को प्रभावित कर रही हैं. रात के समय शहर के मुख्य इलाकों में तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में एक से दो डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है. यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन इसका मतलब है कि शहर में गर्म हवा लंबे समय तक बनी रहती है. रात में जब ग्रामीण इलाकों में तापमान गिर जाता है और ठंडक आ जाती है, तब भी शहर के अंदर गर्माहट महसूस होती रहती है. यह घटना, जिसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहते हैं, देहरादून में साफ तौर पर देखी जा सकती है.
कंक्रीट, सीमेंट और डामर सोखती है सूरज की गर्मीकंक्रीट, सीमेंट, डामर जैसी निर्माण सामग्री दिन भर सूरज की गर्मी को सोखती रहती है और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ती है. इसके विपरीत, मिट्टी, घास और पेड़-पौधे गर्मी को कम सोखते हैं और जल्दी ठंडे हो जाते हैं. देहरादून में जैसे-जैसे हरियाली की जगह कंक्रीट ने ली है, शहर की गर्मी को संभालने की प्राकृतिक क्षमता कम होती गई है. पेड़ों की छांव और उनके द्वारा छोड़ी गई नमी जो कभी शहर को ठंडा रखती थी, वह अब कम हो गई है. इसकी जगह ऐसी सतहें आ गई हैं जो गर्मी को बढ़ाती हैं और हवा के प्रवाह को भी रोकती हैं.
मसूरी के तापमान में नहीं पड़ा शहरीकरण का असरमसूरी का मामला इससे अलग है. वहां भी शहरीकरण हो रहा है, नई इमारतें बन रही हैं, होटल और रिसॉर्ट खुल रहे हैं, लेकिन अभी तक तापमान पर इसका कोई साफ असर नहीं दिखा है. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. मसूरी की ऊंचाई अधिक है, वहां हवा का प्रवाह अलग है और पहाड़ी इलाका होने के कारण शहरीकरण की प्रकृति भी अलग है. लेकिन यह जरूरी नहीं कि मसूरी हमेशा इस प्रभाव से बची रहे. अगर शहरीकरण की रफ्तार जारी रही, तो वहां भी भविष्य में तापमान में बदलाव देखने को मिल सकता है.
डॉ. उज्ज्वल बताते हैं कि जो तापमान के आंकड़े आमतौर पर जारी किए जाते हैं, उनमें शहरीकरण के प्रभाव को अलग से नहीं दिखाया जाता. लेकिन जब इस कारक को शामिल किया जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है. यह अध्ययन इस बात को रेखांकित करता है कि शहरों के विकास की योजना बनाते समय पर्यावरणीय प्रभावों को गंभीरता से लेना जरूरी है. अगर हम सिर्फ विकास की गति को देखें और प्रकृति की कीमत पर निर्माण करते रहें, तो इसका खामियाजा हमें मौसम के बदलाव के रूप में भुगतना पड़ेगा.
यह शोध मेट्रोलॉजी हाइड्रोलॉजी एंड वाटर मैनेजमेंट नाम की शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. इस महत्वपूर्ण अध्ययन में एनएआरएल के विशेषज्ञ विकास सिंह भी शामिल रहे. उनके साझा प्रयासों ने इस बात को वैज्ञानिक आधार दिया है कि देहरादून में बढ़ती गर्मी कोई मनगढ़ंत बात नहीं है, बल्कि शहरीकरण का सीधा परिणाम है.
