फर्जी मार्कशीट से टीचर ?
हमें शिकायत मिली थी कि मुरैना के सरकारी स्कूल में 15 साल से एक शिक्षक नौकरी कर रहा है। उसने नौकरी के लिए जिस डिग्री का इस्तेमाल किया है, वह फर्जी है। जांच में ये शिकायत सही निकली। अभी तक हमने 36 फर्जी टीचर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। ये आंकड़ा 100 से ज्यादा हो सकता है।
यह कहना है स्पेशल टास्क फोर्स (STF) भोपाल और ग्वालियर के एसपी राजेश सिंह भदौरिया का। दरअसल, एसटीएफ ने एक ऐसे संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो पिछले 20 साल से नकली डिग्री के आधार पर 12वीं पास लोगों को सरकारी शिक्षक बना रहा था। इस गिरोह में माध्यमिक शिक्षा मंडल के कुछ बाबू भी शामिल हैं, जो फर्जी डिग्री पर ‘असली’ की मुहर लगाने के नाम पर 2 लाख रुपए लेते थे।
अब एसटीएफ ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक स्पेशल टीम बनाई है। ये उन शिक्षकों की डिग्री की जांच करेगी, जिन्होंने फर्जी तरीके से गिरोह से इसे हासिल किया है। सरकारी बाबुओं से भी पूछताछ की जाएगी।

डिजिटलाइजेशन के नाम पर जांचे दस्तावेज
एसटीएफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि जांच की भनक लगे बिना सबूत कैसे जुटाए जाएं…एसपी राजेश सिंह भदौरिया बताते हैं, ‘हमने एक योजना बनाई। हमने जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के माध्यम से स्कूलों को यह निर्देश भिजवाया कि सभी शिक्षकों के रिकॉर्ड का डिजिटलाइजेशन किया जाना है।
वे अपनी 10वीं, 12वीं और D.Ed. की मार्कशीट जमा कराएं। इस तरह शक के दायरे में आए शिक्षक को बिना कोई संदेह हुए, हमने उसकी मार्कशीट हासिल कर ली।
तीन मार्कशीट जांच के लिए भेजीं
एसटीएफ ने सबसे पहले तीन संदिग्ध मार्कशीटें सत्यापन के लिए माध्यमिक शिक्षा मंडल, भोपाल भेजीं। वहां से जो जवाब आया, वह चौंकाने वाला था।
- मार्कशीट 1: इसमें दर्ज रोल नंबर तो सही था, लेकिन वह किसी और छात्र का था। नाम, पिता का नाम और बाकी सभी जानकारियां फर्जी थीं।
- मार्कशीट 2 और 3: ये दोनों मार्कशीट पूरी तरह से फर्जी थीं। मंडल के रिकॉर्ड में इन रोल नंबरों का कोई अस्तित्व ही नहीं था। न तो इस नाम के किसी छात्र ने कभी परीक्षा दी थी और न ही उन्हें कभी D.Ed. की डिग्री जारी की गई थी।
कॉलेजों ने भी किया इनकार
इसके बाद एसटीएफ की टीम उन कॉलेजों में पहुंची, जिनके नाम डिग्रियों पर अंकित थे। कॉलेजों ने भी अपने रिकॉर्ड की जांच के बाद स्पष्ट कर दिया कि इन शिक्षकों का न तो कभी उनके यहां एडमिशन हुआ, न ही उन्होंने कोई परीक्षा दी।

2 पॉइंट्स में समझिए, 5 लाख में ‘मास्टरजी’ बनाने का पूरा खेल
फर्जी डिग्रियों की पुष्टि के बाद एसटीएफ के सामने बड़ा सवाल था कि आखिर ये हूबहू असली जैसी दिखने वाली डिग्रियां बना कौन रहा है? जांच की सुई जब आगे बढ़ी तो एक ऐसे संगठित गैंग का खुलासा हुआ, जो पिछले 20 साल से यह गोरखधंधा चला रहा है।
1. नाम-पता, रोल नंबर बदलकर बनाते थे नकली डिग्री
एसपी भदौरिया के अनुसार, ‘जैसे कुछ लोग असली नोटों की तरह नकली नोट छापते हैं, ठीक वैसे ही यह गैंग असली डिग्रियों की हूबहू नकल तैयार कर रहा था। उनके पास कुछ असली डिग्रियों के सैंपल थे, जिनमें वे नाम, पता और रोल नंबर बदलकर एकदम असली जैसी दिखने वाली नकली डिग्री बना देते थे।’
यह गैंग सिर्फ D.Ed. तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने BA, B.Com की भी अनगिनत फर्जी डिग्रियां बनाई हैं और अब वे B.Ed. में भी हाथ आजमा रहे थे।
2. तीन लाख रुपए डिग्री और दो लाख डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के
इस गैंग ने हर पोस्ट के लिए एक कीमत तय कर रखी थी। एक फर्जी डिग्री और नौकरी की गारंटी के लिए वे एक उम्मीदवार से 5 लाख रुपए वसूलते थे। इसमें से तीन लाख रुपए हूबहू नकली डिग्री बनाने के लिए जा रहे थे और 2 लाख रुपए नौकरी लगने के बाद डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में डिग्री को ‘असली’ साबित करवाने के लिए थे।
एसपी राजेश भदौरिया बताते हैं कि गिरोह की माध्यमिक शिक्षा मंडल के कुछ बाबुओं से साठगांठ का खुलासा हुआ है। जब भी कोई फर्जी डिग्री वेरिफिकेशन के लिए विभाग में पहुंचती, तो उनके गुर्गे 2 लाख रुपए के एवज में बिना किसी जांच के उस पर ‘सत्यापित’ की मुहर लगा देते थे।

अब जानिए कैसे लगी सिस्टम में सेंध
मध्य प्रदेश में प्राइमरी शिक्षक (वर्ग-3) बनने के पांच चरण हैं। किसी को यदि प्रायमरी टीचर बनना है तो उसे 12वीं के बाद दो साल की पढ़ाई के बाद डी.एड डिप्लोमा हासिल करना होता है। इसके बाद शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करनी होती है।
इसके बाद कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) की ओर से जारी की गई प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होता है। इस परीक्षा में पास होने वाले उम्मीदवारों के अंकों के आधार पर मेरिट लिस्ट बनती है। मेरिट के आधार पर नियुक्ति होती है। इस परीक्षा के आखिरी चरण में डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन होता है।
दो मुख्य स्तरों पर फर्जीवाड़ा
गैंग ने दो स्तरों पर फर्जीवाड़ा किया। गैंग पात्रता परीक्षा और चयन परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए फर्जी D.Ed. की डिग्री मुहैया करा देता था। इस परीक्षा में पास होने के बाद जब उम्मीदवार मेरिट में चयनित हो जाता, तो डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के दौरान मंडल के भ्रष्ट कर्मचारियों के साथ मिलकर उस फर्जी डिग्री का ‘असली’ सत्यापन प्रमाण पत्र बनवा लिया जाता था।

STF के रडार पर शिक्षक, गैंग और सरकारी बाबू
एसटीएफ ने इस मामले को एक संगठित अपराध के रूप में दर्ज किया है। कार्रवाई सिर्फ नौकरी पाने वाले 36 शिक्षकों तक सीमित नहीं रहेगी। एसटीएफ के रडार पर तीन समूह हैं:
- फर्जी शिक्षक: वे सभी शिक्षक जिन्होंने यह जानते हुए भी कि डिग्री फर्जी है, नौकरी हासिल की।
- गैंग के सदस्य: वे लोग जिन्होंने फर्जी डिग्रियां बनाईं और बेचीं। इस गैंग में 8 से 10 लोग शामिल हैं, जिनके तार मालवा, इंदौर और ग्वालियर से जुड़े हैं।
- भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी/अधिकारी: वे लोग जिन्होंने रिश्वत लेकर इन फर्जी डिग्रियों को सत्यापित किया।
एसटीएफ थाना, भोपाल ने फिलहाल 8 नामजद शिक्षकों- गंधर्व सिंह रावत, साहब सिंह कुशवाह, बृजेश रोरिया, महेंद्र सिंह रावत, लोकेन्द्र सिंह, रूबी कुशवाह, रविन्द्र सिंह राणा और अर्जुन सिंह चौहान सहित अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318 (धोखाधड़ी), 358 (जालसाजी), 360 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग) और 61 (आपराधिक साजिश) के तहत एफआईआर दर्ज की है। जल्द ही इस मामले में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू होंगी।

