ठाकरे के अंतिम किले में भी दरार ?

बीएमसी चुनाव भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा शहरी ड्रामा बन गया, जिसमें ठाकरे परिवार की विरासत दांव पर थी। शिवसेना के विभाजन और उद्धव-राज ठाकरे के एक साथ आने से यह राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा। चुनाव परिणाम ठाकरे ब्रांड के लिए बड़ा झटका साबित हुए, जिससे उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता पर सवाल उठ गए। बदलती जनसांख्यिकी और विकास-उन्मुख मतदाताओं के सामने भावनात्मक अपील कमजोर पड़ी, जिससे उन्हें अपनी वापसी के लिए नए सिरे से गढ़ना होगा।
- बीएमसी चुनाव ठाकरे परिवार के लिए अस्तित्व की लड़ाई साबित हुआ।
- धनुष-बाण चिह्न गंवाना और वैचारिक कमजोरी हार का कारण बनी।
- बदलती जनसांख्यिकी और विकास-उन्मुख मतदाता बने निर्णायक कारक।
…. अगर किसी नगर निकाय के चुनाव पर देश भर की निगाहें लगी हों तो उससे इसके महत्व को सहज ही समझा जा सकता है। बृहन्मुंबई महानगर पालिका यानी बीएमसी का चुनाव ऐसा ही रहा। यह चुनाव भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा शहरी राजनीतिक ड्रामा बन गया। ऐसा ड्रामा, जिसमें सत्ता, विरासत, पहचान और भविष्य सब कुछ दांव पर लगा था। करीब ₹75,000 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक बजट वाली बीएमसी न केवल भारत का, बल्कि एशिया का सबसे समृद्ध नगर निकाय है।
यह वह संस्था है जिस पर न केवल मुंबई की सूरत सुधारने का दारोमदार है, बल्कि राजनीति के रंगरूटों को गढ़ने का भी यह एक माकूल मंच है। यही कारण है कि इसके चुनावों को लेकर उत्सुकता का भाव रहता है, लेकिन महानगर की सत्ता पर लंबे समय से काबिज शिवसेना के विभाजन, महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति में आए ढांचागत बदलाव और बीस वर्षों बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के एक साथ आने ने इस चुनाव को राष्ट्रीय सुर्खियों का विषय बना दिया।
बीएमसी के माध्यम से मुंबई दशकों तक बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक प्रयोगशाला रही। यही वह मंच था, जहां से मराठी मानुस की राजनीति ने आकार लिया। हिंदुत्व ने शहरी तेवर पाया और कांग्रेस-विरोध एक स्थायी राजनीतिक मुद्दा बना। इसलिए इस चुनाव के परिणाम युगांतकारी जनादेश का संदेश थे। संदेशों का निहितार्थ ठाकरे परिवार की विरासत से भी जुड़ा है। उद्धव ठाकरे के लिए यह चुनाव राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई था। सिर्फ बीएमसी जीतने की नहीं, बल्कि स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखने की।
राज ठाकरे और उनकी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के लिए यह परीक्षा थी कि क्या वे अब भी मुंबई की राजनीति में कोई मायने रखते हैं। इन सबसे बढ़कर एक प्रश्न और हवा में तैर रहा था कि क्या एकनाथ शिंदे की शिवसेना अब वास्तव में ‘असली शिवसेना’ बन चुकी है? मतदाता का फैसला इन सवालों पर साफ था और यह फैसला ठाकरे ब्रांड के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका साबित हुआ।
ठाकरे बंधुओं की हार के कारण संरचनात्मक हैं और कुछ प्रतीकात्मक भी।
जैसे ‘धनुष-बाण’ जैसा चुनाव चिह्न गंवाना, जो दशकों से मुंबई में मराठी अस्मिता, आक्रामक शहरी राजनीति और बालासाहेब ठाकरे की निर्भीक शैली का प्रतीक था। उसके बिना चुनाव लड़ते हुए उद्धव ठाकरे की शिवसेना लगातार सफाई देती, अपना परिचय कराती और अपनी वैधता सिद्ध करती दिखी, मगर चुनावी राजनीति में यह कमजोरी का संकेत होता है, ताकत का नहीं। बालासाहेब ठाकरे की राजनीति मुख्य रूप से मराठी गौरव, आक्रामक हिंदुत्व और कांग्रेस विरोध पर टिकी थी और इन तीनों ही पहलुओं पर समझौता करके उद्धव की शिवसेना वैचारिक रूप से भी कमजोर दिखी।
चुनावों में ठाकरे गुट की ‘विकास-विरोधी’ होने की छवि भी गहराती चली गई। 1997 से 2022 तक लगभग 25 वर्षों तक बीएमसी पर नियंत्रण के बावजूद ठाकरे खेमे के पास ऐसा कोई ठोस विकास माडल नहीं था, जिसे वे आत्मविश्वास के साथ मतदाताओं के सामने रख सकें। मुंबई जैसे शहर में, जहां मेट्रो, कोस्टल रोड, ट्रांस-हार्बर लिंक और पुनर्विकास परियोजनाएं शहरी जीवन की नई परिभाषा बन चुकी हैं, वहां केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं रही। मतदाता मराठी हो या गैर-मराठी, यह पूछ रहा था कि इतने वर्षों की सत्ता के बाद दिखाने के लिए क्या है?
मराठी मानुस का वोट बैंक भी अब उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे, भाजपा और राज ठाकरे के बीच बंट चुका है। अब मुंबई शहर रोजगार, आवास, पर्यावरण और जीवन-स्तर की बात करता है। यहां केवल भाषा और पहचान की राजनीति से काम नहीं चलने वाला। गैर-मराठी मतदाताओं ने बड़ी संख्या में उस विकल्प को चुना, जो उन्हें स्थिरता, संसाधन और केंद्र तथा राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल का भरोसा देता था। ‘ट्रिपल इंजन सरकार’ का आकर्षण यानी केंद्र, राज्य और बीएमसी में एक ही दल की सरकार का दांव भी मुंबई में एक तरह से निर्णायक साबित हुआ।
समय की चूक ने भी ठाकरे बंधुओं को भारी नुकसान पहुंचाया। चुनाव के लगभग छह महीने पहले ही दोनों पहली बार एक मंच पर आए। संयुक्त रैलियां भी हुईं। यह गठबंधन एक तात्कालिक समझौता अधिक लगा और उसमें दीर्घकालिक सहयोग के संकेत नहीं दिखे। शहर की बदलती जनसांख्यिकी ने भी राजनीति का ढांचा बदल दिया है। आज का एक बड़ा वर्ग, फिर चाहे वह मराठी हो या गैर-मराठी, वह बालासाहेब की राजनीति को पुरानी मिसालों से जानता है, अनुभव से नहीं।
उनकी राजनीतिक चेतना ‘मोदी मॉडल’ के विकास, आकांक्षा और राष्ट्रवादी विमर्श से बनी है। इस नए आकांक्षी मतदाता के सामने ठाकरे बंधुओं के पास भविष्य की कोई ठोस तस्वीर नहीं थी। मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाता जैसे ठाकरे गुट के पीछे लामबंद दिखे थे, वैसा बीएमसी चुनाव में नहीं हुआ। निकाय चुनावों में विचारधारा से अधिक व्यावहारिकता मायने रखती है और यहां भी ठाकरे कमजोर पड़े।
बीएमसी लंबे समय तक शिवसेना की शक्ति का स्रोत और पार्टी के वित्तीय संसाधन, संगठनात्मक नियंत्रण और राजनीतिक प्रभाव की धुरी रही है। बाला साहेब इसे भलीभांति समझते थे और उद्धव ठाकरे को यह विरासत में मिला। आज जब बीएमसी की सत्ता भी हाथ से निकल चुकी है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या उसके बिना ठाकरे ब्रांड राजनीति टिक पाएगी? क्या केवल नाम और पुरानी स्मृतियों के सहारे मुंबई जैसे शहर में राजनीतिक प्रासंगिकता बची रह सकती है?
हालांकि राजनीति में कुछ भी घोषणा करना जल्दबाजी है। खासतौर से यह देखते हुए कि अतीत में भी ठाकरे परिवार ने वापसी की है। मुंबई ने उनके लिए एक कठोर फैसला देने के साथ यह संदेश भी दिया है कि बदलाव करो, खुद को नए रूप में गढ़ो या इतिहास में सिमट जाओ। दादर की गलियों से निकलकर देश की आर्थिक राजधानी पर राज करने वाली पार्टी के बचे-खुचे धड़े को इन सवालों के जवाब जल्द ही तलाशने होंगे।

