….. आसी गच्छीए पनुनुय पाकिस्तान, बताव रोस्तुय बतेनियन सान (हमें अपना पाकिस्तान चाहिए। कश्मीरी पंडित पुरुषों के बिना, लेकिन कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ)। – 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में कश्मीर के मुसलमानों द्वारा सार्वजनिक पर्चों में की गई घोषणा।

मेरे पिता का देहांत हो गया है, हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उनकी अस्थियां (फूल) हरिद्वार में गंगा जी में प्रवाहित करने हमें जाना है। आपसे प्रार्थना है हमें हरिद्वार यात्रा की इजाजत दें – मोहन लाल टिक्कू।

उर्दू दैनिक श्रीनगर टाइम्स के 11 दिसंबर, 1990 के अंक में छपा विज्ञापन जिसमें हिंदू परिवार इस्लामी जिहादियों से हरिद्वार जाने की अनुमति मांग रहा है।

कश्मीरी पंडित कायर थे, दगा दे गए, जिन्होंने अपनी मर्जी से घाटी को छोड़ा। उनको कश्मीर में नौकरियां दीं गईं, फ्लैट दिए गए, लेकिन वे काम नहीं करते, जम्मू में ऐश कर रहे हैं- शोपियां से स्वतंत्र विधायक शबीर अहमद कुले का जनवरी 2026 में न्यूज 18 पर बयान। (विवाद बढ़ने पर बयान वापस लिया)

पृथ्वी पर भारत एकमात्र देश है, जहां के देशभक्त नागरिकों को ‘स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र’ में राष्ट्र ध्वज के प्रति वफादारी और धर्मनिष्ठा के कारण अंतहीन अत्याचारों का शिकार होना पड़ा। अपने ही देश में निर्वासन भोगना पड़ा। कश्मीरी हिंदू अपने घर, सेब के बगीचे, खेत, अखरोट और बादाम के पेड़, सब जस के तस छोड़कर आने पर मजबूर हुए।

कश्मीर के मुस्लिम नेता, उन हिंदुओं के मुस्लिम पड़ोसी, उनके मुस्लिम मित्र सब मुंह मोड़कर अपने ही रक्त बंधुओं और मां-बहनों को रोते-बिलखते जाते देखते रहे। किसी ने उनको रोका नहीं, किसी ने उनको बचाया नहीं।

विश्वास पर गहरा आघात

गिरिजा टिक्कू जैसे अनेक लोमहर्षक उदाहरण कश्मीर की खूनी वादियों में बिखरे हुए हैं। वह पति के साथ कश्मीर के बांदीपोरा नगर में एक स्कूल में प्रयोगशाला सहायिका के नाते काम करती थी। जेकेएलएफ (जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) के कुख्यात मुखिया यासीन मलिक के ‘काफिरों घाटी छोड़ो’ ऐलान के बाद गिरिजा टिक्कू सपरिवार जम्मू आ गई। कुछ दिन बाद उसको श्रीनगर से किसी ने फोन किया कि हालात सुधर गए हैं, तुम आकर अपना वेतन ले जाओ। विश्वास कर वह अपने स्कूल गई।

वेतन लेकर अपनी मुस्लिम सहेली से मिलने आई और सोचा वहां से जम्मू वापस आ जाएगी। वहां उसकी सहेली और नागरिकों के सामने जेकेएलएफ के मुजाहिद गुंडों ने उसका अपहरण कर लिया। गिरिजा टिक्कू को इस्लामी दरिंदे अज्ञात स्थान पर ले गए, दुष्कर्म किया, कई दिन बाद जब उसका क्षत-विक्षत शव मिला तो पता चला उसको आरे से जिंदा काटा गया था। हजरतबल श्रीनगर इलाके से नर्स सरला भट्ट का अपहरण कर लिया गया।

उसके साथ कई दिन सामूहिक दुष्कर्म हुआ। बाद में सड़क किनारे उसका शव मिला। दोनों ही मामलों में किसी के आंसू नहीं बहे, किसी ने इनको मानवाधिकार हनन का मामला नहीं माना। हिंदुओं पर अत्याचार सामान्य और रोजमर्रा की बात मानकर संविधान, सरकार, चुनाव, राजनीतिक उठापटक के दौर चलते रहे। चलती रही पत्थरबाजी, हड़तालें, खूंखार हत्यारे यासीन मलिक की शानदार दिल्ली दावतें और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ उसकी मुलाकातें!

वर्षों बाद मिला न्याय

25 जनवरी, 1998 (गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले)- कश्मीर के गांदरबल जिले के वंधमा गांव में इस्लामी आतंकवादियों ने एक हिंदू परिवार में भारतीय जवानों के वेश में आकर चाय पी और वायरलेस पर जब उनको बताया गया कि सब हिंदुओं को एकत्र कर लिया है तो उन सबको गोलियां मार दीं, जिनमें दो और चार साल के नन्हे बच्चे भी थे। इससे पहले कि पाठक कश्मीर के हिंदू नरसंहार को भूलें, उनको भारतीय वायुसेना के जांबाज अधिकारी स्क्वाड्रन लीडर रविंद्र कुमार खन्ना की शोकांतिका से परिचित कराना जरूरी है।

अमृतसर निवासी स्क्वाड्रन लीडर खन्ना 25 जनवरी, 1990 को श्रीनगर के पास रावलपुरा बस स्टैंड पर वायुसेना बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके साथ वायुसेना के अन्य चार कार्मिक भी थे। जेकेएलएफ के आतंकवादी यासीन मलिक के नेतृत्व में वहां पहुंचे और एके47 से वायुसैनिकों पर गोलियां चला दीं। इस भयानक हत्याकांड की कांग्रेस तथा मुफ्ती-अब्दुल्ला शासनों में गवाहियां तक नहीं हुईं। यासीन इस हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त होने के बावजूद दिल्ली आता रहा, प्रधानमंत्री से मिलता रहा।

पुलवामा हमले (14 फरवरी 2019) के बाद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा अलगाववादियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के तहत यासीन मलिक को 22 फरवरी 2019 को श्रीनगर में हिरासत में लिया गया। अप्रैल 2019 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 2017 के ‘आतंकवाद को आर्थिक मदद’ मामले में पूछताछ के लिए यासीन मलिक को गिरफ्तार किया और दिल्ली के तिहाड़ जेल ले आई।

मई 2022 में विशेष एनआईए अदालत में यासीन मलिक ने सभी आरोपों को कबूल किया, जिसमें आतंकवादी गतिविधियां, आपराधिक साजिश और भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ना शामिल था। 25 मई, 2022 को पटियाला हाउस कोर्ट ने यासीन मलिक को आतंकवाद को आर्थिक मदद मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन वायुसैनिकों की हत्या का मामला अभी चल रहा है और उसमें यासीन को मृत्युदंड मिलना निश्चित है।

स्थापित हो संतुलित जनसंख्या

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के लौह संकल्प ने यह स्थिति कैसे बदली, स्मृतिविहीन समाज आज इसका अनुमान लगाना भी कठिन मान रहा है। हवा बदली, मौसम बदला, पत्थरबाजों का काला दौर खत्म हुआ, धारा 370 और 35ए का अंधा युग समाप्त हुआ, दो झंडों का चुभने वाला सामंती समय समाप्त हुआ, लाल चौक पर हर दिन हर क्षण राष्ट्रीयता का तिरंगा उत्सव अब आम बात हो गई। यह अविश्वसनीय सा यथार्थ न पाकिस्तानी आईएसआई को सहन हुआ, न ही उनके कश्मीर में बैठे एजेंट्स को।

नतीजा हुआ पुलवामा हत्याकांड- जिसमें 26 हिंदू पर्यटकों को उनका धर्म पूछकर क्रूरता से मार दिया गया। आज भी फारूक अब्दुल्ला तथा कुले जैसे कश्मीरी नेताओं के संवेदनहीन बयान बताते हैं कि घाटी के मुसलमान कश्मीरी हिंदुओं की घरवापसी के प्रति सतही बातें करते रहेंगे परंतु उनके मन में प्रतिरोध जमा रहेगा। घाटी में हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ाकर, वहां सैनिक कालोनियां स्थापित करके तथा घाटी का एकतरफा जनसांख्यिकी असंतुलन न्याय संगत करने के बाद ही कश्मीर शांति का स्वर्ग बन सकेगा। यह कार्य लौह नीतियों से ही संभव हो पाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं!

फिर भी जारी रहीं साजिशें

1990 में कश्मीर घाटी में इस्लामिक आतंकवादी , एक हाथ में कुरआन और दूसरे में पाकिस्तानी सहायता से पाए हथियारों को सार्वजनिक प्रदर्शित करते थे । उन्होंने कश्मीर घाटी को हिंदूविहीन कर दिया और देश मूक दर्शक बना देखता रहा। नस्लीय नरसंहार के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान मिटाने की इस्लामी साजिशें हिंदू मंदिरों के अपमान और उनको क्षतिग्रस्त करने के रूप में 2006 के बाद भी जारी रहीं – मंदिरों पर कब्जे और तोड़फोड़ के साथ।

1989 से 2014 तक 1,000 से अधिक मंदिर क्षतिग्रस्त किए गए। मैं 35 वर्षों से कश्मीर क्षेत्र में जाता रहा हूं और आतंकवाद पर हजरतबल से रिपोर्टिंग भी की। मैंने वह दौर देखा है जब जम्मू-कश्मीर के हर कार्यालय, विधान सभा और हर नेता- पक्ष तथा विपक्ष के वाहनों पर दो झंडे लगे होते थे – एक भारत का और दूसरा जम्मू-कश्मीर रियासत का। भारत का कोई कानून भारतीय संसद द्वारा पारित होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर में तब तक लागू नहीं होता था, जब तक वहां के राज्य की विधानसभा उसका अनुमोदन न कर दे!

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कश्मीरी पंडितों पर फिर बहस तेज़ लेकिन सरकारों ने अब तक किया क्या है?

दिल्ली में कश्मीरी पंडित परिवारों का प्रदर्शन (9 दिसंबर, 2007 की तस्वीर)

कश्मीरी पंडितों के दर्द की दो तस्वीरें हैं. एक तस्वीर में वो लोग हैं जिन्हें 1990 के दशक में अपनी ज़मीन को छोड़कर जाना पड़ा. दूसरे में वो जो कभी घाटी छोड़कर गए ही नहीं, अनिश्चितता के साये में बरसों से घाटी में ही रहते आ रहे हैं.

वैसे तो इनके अलग-अलग अनुभव और कहानियां हैं लेकिन एक बात ये एक साथ कहते हैं- ”सरकारों ने हमारे दर्द को कभी ठीक से समझा ही नहीं.”

बीबीसी हिंदी ने ऐसे ही कई लोगों से बातचीत कर ये जानना चाहा कि आख़िर सरकार से कश्मीरी पंडित क्या चाहते हैं और अलग-अलग सरकारों ने इनके लिए क्या किया?

फिलहाल, विवेक अग्निहोत्री की फ़िल्म ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ सुर्ख़ियों में है. सिनेमा हॉल से लेकर सोशल मीडिया तक इस फ़िल्म पर ख़ूब प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.

ऐसा कहा जा रहा है कि फ़िल्म में कश्मीरी पंडितों के ‘सच’ को बेबाक़ी से दिखाया गया है.

सतीश कहते हैं कि फ़िल्म में कश्मीरी पंडितों के पलायन को तो दिखाया गया है लेकिन कई चीज़ें छिपा भी ली गई हैं.

कश्मीरी पंडित

इमेज स्रोत,Hindustan Times

‘सेलेक्टिव तरीक़े से बनाई गई है फ़िल्म’

सतीश महलदार कहते हैं, ”जब कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ उस वक्त बीजेपी समर्थित वीपी सिंह सरकार थी और अब क़रीब 8 साल से केंद्र में बीजेपी की सरकार है लेकिन पलायन किसकी वजह से और किन परिस्थितियों में हुआ, उसकी जांच की गुहार हम लगातार करते आए हैं वो फ़िल्म में कहीं नहीं दिखता.”

सतीश कहते हैं कि आज कश्मीर में 808 कश्मीरी पंडितों के परिवार, जो कभी कश्मीर छोड़कर गए ही नहीं वो किस तरह गुज़र बसर कर रहे हैं, उनकी ज़िंदगियों की क्या कहानी है, इसे भी फिल्म में नहीं दिखाया गया है.

वो कहते हैं, ”उस समय हुई कुछ हिंसा को दिखाया गया है तो कुछ से बचा गया है, कुल मिलाकर विवेक अग्निहोत्री ने सेलेक्टिव तरीके से ये फ़िल्म पेश की है.”

फ़िल्म से अलग सतीश महालदार कहते हैं कि पिछले तीन दशकों से ज़्यादा समय से जो भी सरकारें आईं हैं वो एक एजेंडे पर चली हैं, वो एजेंडा है- ”पूरे भारत में मुद्दा चलाओ-मुद्दा चलाओ, पर इन्हें बसाओ नहीं.”

उनका कहना है, ”बीजेपी ने प्रचार कर दिया कि कश्मीरी पंडितों को बसाएंगे लेकिन पिछले 8 साल से एनडीए सरकार है तो भी ये नहीं हुआ. कांग्रेस ने भी खूब वादे किए लेकिन कुछ ख़ास नहीं किया. लेकिन कांग्रेस ने एक काम किया कि जम्मू में पक्के कैंप बना दिए, जहां विस्थापित रह सकते थे और पीएम पैकेज लेकर आई.”

मनमोहन सरकार के दौरान साल 2008 में कश्मीरी माइग्रेंट्स के लिए पीएम पैकेज का ऐलान किया गया था. इस योजना में कश्मीर से विस्थापित लोगों के लिए नौकरियां भी निकाली गईं थीं.

अब तक कश्मीरी पंडितों समेत अलग-अलग वर्गों के लिए इस योजना के तहत 2008 और 2015 में 6000 नौकरियों का ऐलान हो चुका है. कुछ हज़ार विस्थापित ये नौकरियां कर भी रहे हैं. इन लोगों को कश्मीर में बनाए गए ट्रांज़िट आवासों में रहना होता है.

कश्मीरी पंडित

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”हम तो कहीं के नहीं रहे”

इस योजना के तहत नौकरी पाने वाले में से एक कश्मीरी पंडित नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि योजना को कश्मीरी पंडितों को बसाने वाली योजना के तौर पर नहीं देखना चाहिए.

मार्च 1990 में 15 साल की उम्र में उन्हें कश्मीर में अपना घर छोड़ना पड़ा था. अब वो इस योजना के तहत कश्मीर में बतौर शिक्षक के तौर पर काम कर रहे हैं.

वो कहते हैं, ”हम कहीं के नहीं रहे, कश्मीरी में हमारा पैतृक घर छीन लिया गया, जब जम्मू में रहने लगे तो सरकार ने एक परिवार से एक सदस्य को लाकर कश्मीर में नौकरी के लिए पटक दिया.”

उनका कहना है कि उनकी सारी फैमिली जम्मू में रहती हैं, घर पर बीमार माता-पिता है लेकिन नौकरी के लिए उन्हें कश्मीर जाना पड़ता है.

कश्मीरी पंडित

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जम्मू में नौकरी की मांग करते हुए कहते हैं, ”आज हमारे पास दो दर्द है, मेरे घर की हालत कैसी है मैं देख तक नहीं पाता. एक तरफ़ घरवालों से दूर रहता हूं, दूसरा ऐसी जगह रहता हूं जहां आज़ादी का अहसास नहीं होता है.”

पिछले साल गृह मंत्रालय की तरफ़ आँकड़े जारी हुए थे. उसमें बताया गया था कि 1990 में स्थापित राहत कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक़, 1990 के बाद से जिन परिवारों को घाटी छोड़कर जाना पड़ा था, उनमें से 44,167 कश्मीरी प्रवासी परिवार रजिस्टर्ड हैं.

इनमें हिंदू प्रवासी परिवारों की संख्या 39,782 है. पीएम पैकेज के तहत रोज़गार के अलावा इन परिवारों में जो अपने मूल स्थान पर बसना चाहते हैं उनके लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है, साथ ही कश्मीरी प्रवासियों को नकद राहत दी जाती है.

कश्मीरी पंडित

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कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडित क्या सोचते हैं?

अब जो कश्मीरी पंडित, घाटी छोड़कर गए ही नहीं, उनमें से कई अब अपने आपको ठगा हुआ महसूस करते हैं.

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के प्रेसिडेंट संजय टिक्कू उन कश्मीरी पंडितों में से एक हैं जो अब भी कश्मीर में ही रहते हैं. अब वो इन ग़ैर-विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

डाउनटाउन के हब्बा कदल इलाक़े में बर्बर शाह मोहल्ले में रहने वाले संजय टिक्कू बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहते हैं कि ऐसे कुल 808 परिवार हैं और कश्मीरी पंडितों के पलायन ने उनके समुदाय को दो हिस्सों में बांट दिया है- माइग्रेंट और नॉन माइग्रेंट्स.

वो इसे ग़लत बताते हैं, और कहते हैं अलग-अलग सरकारों ने उन कश्मीरी पंडितों की चिंता ख़ूब की जो यहां से चले गए लेकिन जो यहाँ रह रहे हैं उनके बारे में कोई नहीं सोचता.

टिक्कू का कहना है कि जब मनमोहन सिंह ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के राहत और पुनर्वास का ऐलान किया था तो कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति ने गैर-विस्थापित पंडितों को भी हिस्सेदारी देने की मांग की थी.

वो कहते हैं,”हाईकोर्ट में जाने और वहां से फ़ैसला पक्ष में आने के बाद भी कुछ भी नहीं बदला, हमने 500 बच्चों को रोज़गार देने की मांग की थी, अब उनकी उम्र भी निकल रही हैं.”

‘हम भी कश्मीर छोड़ देंगे’

संदीप कौल भी ऐसे ही युवा हैं. वो कहते हैं, ”घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है. सरकारें यहां के पंडितों के लिए कुछ नहीं करतीं.”

30 साल के संदीप कहते हैं कि वो कुछ और दिन सरकारी नौकरी का इंतज़ार करेंगे नहीं तो रोज़गार की तलाश में वो भी कश्मीर छोड़ सकते हैं.

वो कहते हैं, ”उम्र हो रही है हमें भी रोज़गार के लिए कहीं जाना होगा, यहाँ बहुत ज़्यादा नौकरियों के मौके नहीं हैं.

”ये नहीं देखा जाता है कि जहां विस्थापित लोग बाहर जाकर रह रहे हैं, उन्हें उच्च शिक्षा में छूट और दूसरी सुविधाएं मिल रही हैं लेकिन हमारी ज़िंदगी तो बंदूकों और डर के साए में ही कट रही है.”

सतीश महलदार भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं, कहते हैं कि गैर-विस्थापितों के लिए सरकारी योजनाओं में कुछ भी नहीं है.

सतीश कहते हैं, ”न ही उन्हें सरकारी नौकरियों में हिस्सा है न ही कोई आर्थिक मदद. उनकी हालत बद से बदतर होती जा रही है.”

विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवारों की मांग को लेकर सतीश का कहना है कि परिवारों की पुनर्वास और वापसी सबसे बड़ी मांग है.

सतीश का कहना है, ”इसके लिए हमने नेशनल ह्यूमन सैटलमेंट पॉलिसी बनाकर दे दी, हमने कहा कि आप पैकेज भी मत दीजिए, जम्मू कश्मीर के बजट में से 2.5 फ़ीसदी दे दिया जाए. जो वापस जाना चाहते हैं, उनके लिए कॉलोनी बनाई जाए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा है रोज़गार का, क्योंकि अगर लोग वापस आएँगे तो उन्हें अच्छी नौकरियां भी तो चाहिए होंगी. तीसरी बात है कि जिन परिस्थितियों में कश्मीरी पंडितों को निकाला गया और जो लोग इसमें शामिल थे, उस मामले की जाँच होनी चाहिए.”

सतीश का कहना है कि अभी तक इन मामलों की जांच तक नहीं हुई है. इंसाफ़ के लिए मामला दर्ज़ होकर इनके पीछे शामिल हुए लोगों का पता लगाना चाहिए.

सतीश महलदार का दावा है कि जिस तरह से सरकार ये कहती है कि कुछ लोगों को फिर से लाकर बसा दिया गया है, वो पूरी तरह से झूठ है. ”मुझे भी तो दिखा दीजिए कि आख़िर कौन लोग हैं जो वहां गए हैं, मैं जम्मू-कश्मीर जाता रहता हूं, मेरे हिसाब से ये सही नहीं है.”

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”सरकारों की तरफ़ से लगातार होती आईं हैं गलतियां”

जम्मू-कश्मीर पर निगाह रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन कहती हैं कि 1990 के दशक से ही सरकारों की तरफ़ से लगातार गलतियां होती आईं हैं.

वो कहती हैं 1990 के दशक में कश्मीर में जिस तरह से अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ माहौल बना तो उसे ग़लत तरीक़े से लिया गया और पलायन को प्रोत्साहित भी किया गया.

भसीन कहती हैं,”विस्थापन के बाद कश्मीरी पंडितों को वापस ले जाने के लिए किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया.”

वो कहती हैं कि इन तीस सालों के दौरान जिस तरह की कट्टर बयानबाज़ी दोनों तरफ़ से हुई, उसकी वजह से कश्मीरी पंडितों की वापसी और मुश्किल हो गई.

”2008 के बाद मनमोहन सरकार में जो स्कीम लाई गई, उसमें कुछ हद तक कामयाबी मिलती दिखी. बीजेपी की सरकार ने भी इस पॉलिसी को जारी रखा लेकिन 2017 के बाद मुझे नहीं लगता कि लोगों ने इस पॉलिसी का फ़ायदा उठाया, क्योंकि दूसरी नीतियों की वजह से वादी में माहौल ज़्यादा ख़राब हो रहा था.”

अनुराधा भसीन का मानना है कि जिस तरह की नफ़रत फैली है और असुरक्षा का भाव है, उससे अब कश्मीरी पंडितों की वापसी और मुश्किल हो गई है.

वो कहती हैं,”सुरक्षा के साथ ही साथ इंसाफ़ का भाव भी इससे जुड़ा होता है लेकिन उस वक्त जितनी भी हत्याएं हुईं चाहे कश्मीरी पंडितों की हुईं या मुसलमानों की लेकिन इसके बावजूद आज तक कहीं भी एक निष्पक्ष जांच नहीं हो सकी है.”

भसीन कहती हैं, ”बीजेपी का दावा रहता है कि वो कश्मीरी पंडितों के पक्ष में बोलती है लेकिन उसकी सरकार आने के बाद भी जांच तो दूर कुछ फ़ाइल क्लोज़ कर दी गईं. ये बताते हुए कि काफ़ी पुरानी बात हो गई, या फैक्ट मौजूद नहीं हैं.”

अनुराधा भसीन बताती हैं कि अगर कश्मीरी पंडितों को बसाना है तो इसके लिए समुदायों को साथ लाना होगा. उनके बीच नफ़रतों को दूर करना होगा.

वो कहती हैं, ”बीजेपी की राजनीति समुदाय पर आधारित होती है तो ऐसे नफ़रतों को दूर करना मुश्किल होगा.”

भसीन का कहना है कि आर्टिकल 370 हटाने के बाद ये दावा किया गया कि कश्मीरी पंडित अब वापस चले जाएंगे लेकिन इस मुद्दे से तो कभी बाधा थी ही नहीं.

वो पिछले साल कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ़ हिंसा का भी ज़िक्र करते हुए कहती हैं कि ये बढ़ती नफ़रतों की वजह से ही हुआ और इसे जब तक माहौल नहीं सुधारा गया तब तक विस्थापित कश्मीरियों की वापसी मुश्किल है.