खतरा बना एंटीबायोटिक का दुरुपयोग !
अंततः एएमआर केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत चुनौती है। आज एंटीबायोटिक्स का जिम्मेदार उपयोग ही यह तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियों के पास इलाज के प्रभावी विकल्प बचेंगे या नहीं।
- एंटीबायोटिक का दुरुपयोग गंभीर AMR संकट पैदा कर रहा है।
- सरकार, IMA और समाज की साझा जिम्मेदारी आवश्यक है।
- पर्यावरण में एंटीबायोटिक अवशेष फैलना चिंताजनक है।
डॉ. नरेंद्र सैनी। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) आज दुनिया के सामने खड़े सबसे गंभीर, लेकिन सबसे कम समझे गए या जा रहे सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में से एक है। यह समस्या धीरे-धीरे उपचार के आधार को कमजोर कर रही है। बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और परजीवी जब दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, तब सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों पर इसका असर और भी गहरा है, जहां संक्रमण का बोझ अधिक और स्वास्थ्य संसाधन सीमित हैं।
2019 में दुनिया भर में लगभग 50 लाख मौतें एएमआर से जुड़ी थीं। यदि वर्तमान में हम इसे लेकर जागरूक नहीं हुए और इस पर नियंत्रण नहीं किया, तो भविष्य में यह संख्या प्रतिवर्ष एक करोड़ तक पहुंच सकती है। यह संकट इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं, जब उपचार बेअसर होने लगता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
प्रधानमंत्री मोदी यह कहते रहे हैं कि चिकित्सकीय परामर्श के बिना एंटीबायोटिक का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह अपील इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आम सर्दी-खांसी, बुखार या वायरल संक्रमण जैसे कई रोग स्वयं ठीक हो जाते हैं, जिनमें एंटीबायोटिक का कोई रोल नहीं होता। इसके बावजूद दवाओं का अनावश्यक और तर्कहीन उपयोग हमारे समाज में आम व्यवहार बन चुका है। इस तरह का अंधाधुंध प्रयोग सूक्ष्म जीवों को और अधिक प्रतिरोधी बनने का अवसर देता है, जिससे भविष्य में जीवन रक्षक दवाएं असरहीन हो सकती हैं।
यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि जिस गति से सूक्ष्म जीव प्रतिरोधी बन रहे हैं, उस अनुपात में नई एंटीबायोटिक दवाएं विकसित नहीं हो रहीं। पिछले लगभग दो दशकों में एंटीबायोटिक्स की कोई नई प्रमुख श्रेणी सामने नहीं आई है। एक नई एंटीबायोटिक दवा विकसित करना 15 से 20 वर्षों का लंबा, जटिल और अत्यंत महंगा कार्य है। भारी निवेश के बावजूद आर्थिक प्रतिफल सीमित रहता है। यही कारण है कि फार्मास्युटिकल कंपनियां इस क्षेत्र में बड़े निवेश से कतराती हैं।
सरकार ने एएमआर को रोकने के लिए कई स्तरों पर कार्ययोजना बनाई है। राष्ट्रीय कार्ययोजना के तहत निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जा रहा है, ताकि दवा प्रतिरोध के रुझानों पर समय रहते नजर रखी जा सके। एंटीबायोटिक की ओवर-द-काउंटर बिक्री पर नियंत्रण, अस्पतालों में एंटीमाइक्रोबियल स्टूअर्डशिप कार्यक्रम और प्रयोगशाला आधारित जांच को बढ़ावा देना इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। पशुपालन, कृषि और मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक के उपयोग को नियंत्रित करने के प्रयास भी सरकार की वन हेल्थ रणनीति का हिस्सा हैं, जो मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा मानती है।
इस लड़ाई में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी अहम भूमिका में है। आइएमए देश भर के चिकित्सकों को एएमआर के प्रति जागरूक करने, जिम्मेदार प्रिस्क्रिप्शन को बढ़ावा देने और आम जनता तक सही संदेश पहुंचाने में सक्रिय जिम्मेदारी निभा रहा है। आइएमए की एएमआर कमेटी लगातार यह चेतावनी देती रही है कि एंटीबायोटिक का दुरुपयोग केवल इलाज को मुश्किल नहीं बनाता, बल्कि पूरी पीढ़ी के लिए खतरा पैदा करता है। एंटीबायोटिक का सबसे अधिक दुरुपयोग मानव स्वास्थ्य की रक्षा के बजाय पशुओं, फल और सब्जियों की ग्रोथ बढ़ाने में हो रहा है।
इस संकट का एक गंभीर पहलू पर्यावरण और नदियों से भी जुड़ा है। मानव गतिविधियों, अस्पतालों के अपशिष्ट, औद्योगिक कचरे, फार्मों से बहकर आने वाले एंटीबायोटिक अवशेष और पशुओं के मल-मूत्र के कारण नदियां, तालाब और भूजल भी एएमआर से संक्रमित हो रहे हैं। कई नदियों में रेजिस्टेंट बैक्टीरिया और एंटीबायोटिक अवशेष पाए जाने की चेतावनियां विशेषज्ञ लगातार दे रहे हैं। ये एएमआर का सक्रिय वाहक बनते जा रहे हैं, जो पानी, मिट्टी और खाद्य शृंखला के जरिये मानव तक यह खतरा पहुंचा रहा है। इससे भोजन शृंखला दूषित और जल स्रोत संक्रमित हो रहे हैं। सामान्य जल शोधन प्रणालियां एएमआर को छानने में सक्षम नहीं हैं, जिससे यह पानी के जरिये भी मानव शरीर में प्रवेश कर रहा है।
एएमआर के खिलाफ लड़ाई केवल डाक्टरों या सरकार की नहीं, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। जब तक आम नागरिक इस खतरे को नहीं समझेंगे, तब तक नीतियां और नियम सीमित असर ही दिखा पाएंगे। एंटीबायोटिक का उपयोग केवल योग्य चिकित्सकों की पर्ची पर होना चाहिए। दवाओं की पूरी खुराक और सही अवधि का पालन जरूरी है। ओवर-द-काउंटर बिक्री पर लगे प्रतिबंधों का सख्ती से पालन होना चाहिए।
स्वच्छता, साफ-सफाई, सुरक्षित पानी और व्यापक टीकाकरण संक्रमण को रोकने के सबसे प्रभावी साधन हैं। बेहतर डायग्नोस्टिक सुविधाओं से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सही बीमारी में सही दवा दी जाए। साथ ही एंटीमाइक्रोबियल अनुसंधान और नवाचार के लिए सरकारी निवेश और प्रोत्साहन बढ़ाना समय की मांग है। अंततः एएमआर केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत चुनौती है। आज एंटीबायोटिक्स का जिम्मेदार उपयोग ही यह तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियों के पास इलाज के प्रभावी विकल्प बचेंगे या नहीं।

