डॉ. विशेष गुप्ता। पिछले दिनों गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों ने अपने आवास की नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। 12,14,16 साल की आयु अपने जीवन के सपनों को बुनने और उन्हें बड़े लक्ष्यों के साथ पूरा करने की होती है, मगर लगता है इस उम्र में समाज और परिवार की वास्तविक दुनिया को छोड़कर आभासी दुनिया, गेमिंग और डिजिटल मीडिया की गिरफ्त में आकर बचपन हिंसा की ओर मुड़ चला है। तीनों को कोरोना काल से ही कोरियाई लव गेम, कोरियाई ड्रामे, गाने और मूवी देखने की लत लग गई थी।

वे तीनों कोरियाई संस्कृति से इतनी प्रभावित थीं कि अपने नाम के साथ-साथ जीवनशैली को भी उसी संस्कृति के अनुरूप ढाल लिया था। टास्क-बेस्ड डिजिटल गेम्स ने इन लड़कियों को पहले किताबों से दूर किया, फिर उनकी वास्तविक दुनिया भी समाप्त कर डाली। कोरियाई गेम की लत के कारण ही उन्होंने स्कूल जाना बंद कर दिया। तीनों बहनों में एक बहन डेथ कमांडर की भूमिका निभाते हुए बाकी दोनों को टास्क पूरा कराने में भूमिका निभाती थी। तीनों लड़कियों के सुसाइड नोट से जुड़े शब्द आइ.एम.सारी पापा-मैं गेम नहीं छोड़ पा रही हूं, यही बताते हैं कि ये किशोरियां एक टास्क-बेस्ड डिजिटल गेम से जुड़ी पूर्व नियोजित योजना की शिकार थीं।

गाजियाबाद की घटना उन सभी के लिए एक चेतावनी है, जो अपने बच्चों पर भरोसा किए बैठे हैं कि उनका बच्चा बंद कमरे में मोबाइल चलाते हुए सुरक्षित है। इस घटना के बाद से कई माता-पिता अपने बच्चों को लेकर मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट बताते हैं कि टास्क-बेस्ड गेम में डिजिटल कंटेंट को नाबालिग वर्ग तक बड़ी चतुराई से पहुंचाया जाता है। सर्वेक्षण बताते हैं कि किशोर-किशोरियों के बीच कोरियाई, चीनी एवं जापानी कंटेंट को बिटक्वाइन मुद्रा का लालच देकर भी योजनाबद्ध तरीके से उन तक पहुंचाया जा रहा है। बीते दिनों संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में भी कहा गया है कि इंटरनेट मीडिया और अन्य आनलाइन प्लेटफार्म्स पर बच्चों और किशोरों की बढ़ती निर्भरता उनकी पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य के साथ उनके सामाजिक जीवन को भी बुरी तरीके से प्रभावित कर रही है।

इससे निपटने के लिए आनलाइन कंपनियों को उम्र सत्यापन के लिए जिम्मेदार बनाने और बच्चों के लिए सरल एवं सुरक्षित डिजिटल उपकरणों को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है। आस्ट्रेलिया और फिनलैंड में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया पर प्रतिबंध के लिए कानून लागू हैं। फ्रांस की नेशनल असेंबली में ऐसा कानून लाने पर सहमति बन चुकी है। ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस भी इससे जुड़ा कानून बनाने की तैयारी में हैं। भारत में एक अरब से अधिक इंटरनेट यूजर्स हैं। इनमें से 50 करोड़ से अधिक यूट्यूब, 40 करोड़ से अधिक फेसबुक तथा 48 करोड़ से अधिक इंस्टाग्राम यूजर हैं। इंटरनेट मीडिया के इन प्लेटफार्म्स पर 75 प्रतिशत से अधिक यूजर्स कम उम्र के हैं। इसके कारण उनमें नींद की कमी, कम एकाग्रता, घबराहट, अवसाद एवं आत्मविश्वास में कमी और साइबर बुलिंग के मामले भी सामने आ रहे हैं। इनके कारण बच्चों का शैक्षणिक प्रदर्शन भी लगातार प्रभावित हो रहा है।

परिवार के विखंडन के इस दौर में सबसे अधिक बचपन प्रभावित हुआ है। दादा-दादी, नाना-नानी के संरक्षण में कहानियां सुनने वाला बचपन अब कंप्यूटर, इंटरनेट, टीवी, वीडियो और मोबाइल गेम्स जैसे संचार माध्यमों के बीच की मशीनी दुनिया के साथ विकसित हो रहा है। बच्चों के इस मनो-शारीरिक विकास में दैहिक समाज नदारद है। आज आर्थिक दबावों के समक्ष माता-पिता को भी इतनी फुरसत नहीं है, जो बच्चे को यह बता सकें कि जीवन में उसके लिए चीजों को चयन करने की दिशा क्या होगी।

बच्चों को अपने सामने बिठा कर संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों की सीख देने वाले परिवार और स्कूल भी उनसे दूर हो रहे हैं। बच्चों का बचपन मनोरंजन की दैहिक दुनिया से छिटककर संचार माध्यमों की दुनिया तक सिमट रहा है, जहां उनके मनपसंद कार्यक्रम चयन का अपना भरा-पूरा यांत्रिक संसार है। बच्चों के विवेक हरण एवं चेतना के दमन का कार्य करते हुए ये सभी साधन उनके जीवन को रोमांचक बना रहे हैं। इसी दौरान कभी-कभी टास्क बेस्ड रोमांच उन्हें आत्मघात की ओर भी ले जाता है।

इक्कीसवीं सदी में पारस्परिकता, वैयक्तिकता, प्रेम, बंधुत्व, मनुष्यता, सहानुभूति एवं मानवीय संवेदना जैसे मूल्यों का अभाव है। इससे सबसे अधिक बच्चों का बचपन ही प्रभावित हो रहा है। संचार माध्यमों ने इन बच्चों को भी उपभोक्ता बना कर रख दिया है। परिणामस्वरूप बच्चे भी इस बाजार की गलाकाट होड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं। बच्चों की इस पीढ़ी में सफलता प्राप्त करने की तीव्र इच्छा तो है, परंतु जीवन में असफलता की स्थिति में धैर्य एवं संयम का पूर्णत: अभाव है। डिजिटल मीडिया ने उनके ज्ञानात्मक पक्ष के विवेक को शून्य कर दिया है। बच्चों के जीवन का यह नूतन आयाम बहुत गंभीर चिंता का विषय है। बच्चों के जीवन से इस रोमांच के साथ-साथ स्क्रीन टाइम को कम करने के लिए आवश्यक है कि उनके एकाकीपन, तनाव, निराशा एवं कुंठा से जुड़ी चुनौतियों को उनकी रचनात्मक गतिविधियों में बदला जाए।