आजादी का जहर ..?

म आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। अमृत, देवताओं के हाथ से छीनकर राहु राक्षस ले गया। देवता 33,असुर 99 यानी तीन गुना हैं। अमृत राहु को देवतुल्य स्थान दे रहा है। स्वतंत्रता स्वच्छन्दता में परिवर्तित हो चली है। स्वतंत्रता में तंत्र है, मर्यादा है, बन्धन है। मर्यादा दिव्य गुण है, असुर बलवान हैं-अत: अमर्यादित हैं। ये हर युग में रहे हैं। अवतार रूप में ईश्वर को धरा पर बुलाने का श्रेय असुरों को ही जाता है। सदा ही असुर सद्पुरुषों का अहित करके अट्टहास करते रहे हैं। कलियुग में तो सर्वत्र इन्हीं का बोलबाला हैं। क्यों?

एक-शिक्षा प्रणाली सबसे बड़ा कारण है। मानव को एकदम संवेदनहीन व स्वार्थी बना रही है। अंग्रेजी ने पराया कर दिया-अपनी संस्कृति बेचकर। आज के अधिकांश शिक्षित बेशर्मी से देश को लूटते हैं,अपने देशवासियों का अहित करने से नहीं चूकते-अपने स्वार्थ के लिए।

दो-सिनेमा ने भारतीय संस्कृति की जड़ें खोखली कर डाली। उसे पैसा चाहिए, अय्याशी चाहिए। नारी उसके भोग की सामग्री बन गई। शिक्षित माताएं भी अपनी सन्तान को संस्कार नहीं देती। जो भारतीय सिनेमा कभी दर्शकों के मन को पवित्रता से सींचता था, वह आज शरीर के भोग पर आकर ठहर गया है। नशा और यौनाचार का चोली-दामन का साथ है। आज सिनेमा, धन लगाने वालों के नियंत्रण में है। संस्कारविहीन समाज का निर्माण हो रहा है।

तीन-सोशल मीडिया-मानव समाज में ऐसा अमर्यादित एवं भद्दा संवाद कल्पना के बाहर है जो सोशल मीडिया के जरिए हो रहा है। शायद ही कोई भलामानस होगा जो इससे विचलित ना होगा। ज्यादातर वेबसीरीज तो जैसे समाज के नासूर बन रहे हैं। चारित्रिक पतन कर रहे हैं। झूठ का ध्वजारोहण हो रहा है। नई पीढ़ी घर से पहले ही खोखली है, सोशल मीडिया का घुन उसे लील जाएगा।

चार- राजनीति- देश की अखण्डता को यदि किसी ने तार-तार किया है तो वह शक्ति है-राजनीति, वोट की राजनीति। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि को जनता का प्रतिनिधि अर्थात जनरक्षक व जनसेवक माना गया था। आज वही सबसे बड़ा विपक्ष बनकर सामने खड़ा है। सत्ता पक्ष तो माटी से ही दूर होने को उतावला रहता है। वोट देने वालों को निचोड़कर उनके खून का प्यासा हो रहा है। वोट के लालच में देश विरोधी कृत्यों से भी हिचकता नहीं।

आज का राजनेता, जातिगत रूप में देश के टुकड़े-टुकड़े कर रहा है और शपथ अखण्डता और एकता की लेता है। अल्पसंख्यक व आरक्षित जैसे शब्दों से बंटा देश अपनों के बीच असुरक्षित होता जा रहा है। अपनों से अपमानित होता रहता है। यह सब राजनीति शकुनियों का खेल है। यह द्रोपदी के चीरहरण जैसा प्रयास है, जिसका लाभ किसी वर्ग को नहीं मिला। कुछ परिवार अपवाद भी हो सकते हैं।

सही-गलत का भेद समाप्त

राजनीति ने ही राज्यों की, विधायिका की सीटों की व जिलों की सीमाएं बदल- बदल कर धरती को वोटों के लिए चीरा है। गरीब और गरीब हो रहा है। सारी सुविधाएं अंग्रेजीदां लोग और सत्ताधीशों को उपलब्ध हैं। मुफ्त सेवाएं, वीवीआइपी सेवा उनके लिए है। बीपीएल को न रोटी, न पानी।

भारत जैसा महान राष्ट्र राजनीति की भेंट चढ़ गया। बीस प्रतिशत मुस्लमान पहले टूटा। 80 प्रतिशत का खण्ड अलग हो गया। 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण ने अब तीन टुकड़े कर दिए। टुकड़े इसलिए कि कोई एक धड़ा दूसरे को अपने देशवासी की तरह नहीं देखता। बल्कि उसका अहित करना चाहता है। राजनीति अलग-अलग धड़ों को एक-दूसरे के खिलाफ उकसाती है। जहर उगलती है। आज किसी भी एक धड़े पर दूसरा धड़ा आक्रामक हो सकता है। राजनीति, जनता के बजाए किसी एक धड़े का समर्थन करती दिखाई देगी।

देश की व जनता की चिन्ता को राजनीति या सत्ता का मोह खाता जा रहा है। यही आसुरी भाव है। दूसरों का अहित कर स्वयं का हित साधन-वह भी काल्पनिक-ही अज्ञान कूप है। इसी का परिणाम है ‘धर्मस्यग्लानि’ और इसी की चिकित्सा है ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’। यह हर दिल में बैठी है, सुप्त लग रही है। जनता लाचार दिखाई दे रही है। युवा कुछ कर नहीं पाने के अपराध बोध से-बेरोजगारी से ग्रसित है। राजनीति उसे सब्जबाग ही दिखाती है। भौतिक सुखों की चाह में शिक्षा प्रणाली की विसंगतियां आग में घी का काम कर रही है। पात्रता है या नहीं, रातों-रात व्यक्ति सब-कुछ पाना चाहता है। सरकारें मुफ्त बांटने लगी हैं। घर बैठे पेट भर रहा है। बिना पेट भरने की चिन्ता किए अपराधी मस्त है। चुनावों में उसकी मदद राजनेता को चाहिए। अपराधी को आश्रय देना लाचारी है राजनेता की।

दूसरी सच्चाई यह भी है कि भ्रष्टाचार का धन राजनेता नहीं भोग सकता। यह बड़े पैमाने पर होता है। इसे खपाने के लिए बड़ा अपराधी चाहिए-माफिया चाहिए। हथियार-नशा-हिंसा ये तीन नेत्र होते हैं माफिया के। तीनों ही देश-दुनिया के शत्रु हैं आज। हर देश की राजनीति मूल में माफिया ही चलाता है। नेता उनके हाथों में कठपुतलियां बनते जा रहे हैं। उन्हें धन के आगे देश छोटा लगता है। जिस वोटर को वे साधना चाहते हैं, पिछले दरवाजे से उसी को उजाड़ते जाते हैं। सही-गलत का भेद समाप्त हो गया। अपराधी सही और कानून गलत हो गया। बड़े-बड़े न्यायालयों के फैसले लागू नहीं हो पा रहे। पुलिस भी सरकार की गुलाम है। वह आज तो कमाऊ पूत भी है।

हर सदाचारी कम्पित है। माताएं अप्रत्याशित आपातकाल-अपहृत होते लाल-कन्या के हलाल और समाज में फैलते हलाहल से विषादग्रस्त होने लगी हैं। क्या वोट मांगने घर-घर जाने वाले राजनेताओं के दिलों को इनकी पीड़ा छू पाएगी?

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