2800 करोड़ रुपए का नुकसान कराने वाले 51 इंजीनियर बच गए ???
मप्र की एकल ग्राम नल-जल योजना में इंजीनियरों ने सरकार को 2800 करोड़ का झटका दिया है। इसका खुलासा तब हुआ, जब मुख्य सचिव के कहने पर 28000 गांवों की नल योजनाओं की जांच की गई। 8000 गांवों में ऐसी कमियां मिली, जिसकी वजह से 20 हजार करोड़ वाली स्कीम 23 हजार करोड़ के करीब पहुंच गई। जिन इंजीनियरों की वजह से लागत बढ़ी, उनमें 44 को रिटायर हुए चार साल से अधिक हो गए। छह की मौत हो गई और एक इस्तीफा दे चुका है।
सरकार का नियम है कि रिटायरमेंट या इस्तीफे के चार साल बाद कार्रवाई नहीं हो सकती। बाकी बचे 90 लोगों को आरोप-पत्र जारी किया गया है। इनका इंक्रीमेंट रोकने और विभागीय जांच की तैयारी है। जानकारी के मुताबिक 34 लोगों को शासन के स्तर पर व 40 इंजीनियरों को प्रमुख अभियंता के स्तर से चार्जशीट जारी हुई है। सोलह लोग रिटायर तो हुए, लेकिन चार साल पूरे नहीं हुए, इसलिए उन्हें भी शासन स्तर से चार्जशीट दी गई है।
लागत बढ़ाने की फाइल उच्च स्तर पर पहुंची तब हुआ खुलासा
योजना की लागत 15% बढ़ाने की फाइल उच्च स्तर पर पहुंची। पीएचई के प्रमुख सचिव पी. नरहरि ने विभाग की ओर से प्रस्ताव दिया। मुख्य सचिव अनुराग जैन और एसीएस वित्त मनीष रस्तोगी के सामने बताया गया कि लागत रिवाइज नहीं की तो 7 लाख घरों में पानी नहीं आएगा।
पूछा गया कि लागत क्यों बढ़ी तो 28 हजार गांवों का रिव्यू हुआ। 8 हजार में कमियां मिलीं। दुरुस्त करने के लिए वित्तीय आंकलन किया गया तो 2800 करोड़ की जरूरत बताई गई। मुख्य सचिव ने कहा, दोषियों को भी सामने लाओ। तब 141 ईई, असिस्टेंट इंजीनियर और सब इंजीनियरों की कारस्तानी सामने आई। योजना में यह अब तक की सबसे बड़ी कमी है।
स्कीम अधूरी, डीपीआर गड़बड़
- मौके पर गए बिना डीपीआर बना दी गई। पाइप लाइन बिछाने में मजरे-टोले छोड़ दिए।
- पुरानी योजना से जो काम हुए, उनमें 33-50% तक कमी थी। जिन स्कीम में गड़बड़ी थी, उनकी लागत 25-50% बढ़ी हुई मिली।
अब 93% तक कवरेज
एक तरफ जांच और दूसरी तरफ एकल ग्राम नल-जल योजना को व्यवस्थित करने की कवायद हुई। विभाग का दावा है कि 28 हजार गांवों में अब नल जल की पहुंच में 93% गांव आ गए हैं।
इंजीनियरों की कमी की वजह से लागत बढ़ी है। जिन इंजीनियरों को रिटायर हुए चार साल से ज्यादा वक्त हो गया है, उन पर कार्रवाई नहीं हो सकेगी। बाकी लोगों को आरोप-पत्र दे दिया गया है। जल्द कार्रवाई होगी। -पी. नरहरि, प्रमुख सचिव, पीएचई

