दिल्ली

हिंदी और उर्दू सगी बहनें हैं, इन्हें सौतेलेपन से बचाएं !

हिंदी और उर्दू सगी बहनें हैं, इन्हें सौतेलेपन से बचाएं

शायद यह सरलीकरण है, क्योंकि इस बात के बावजूद कि उन दिनों साम्प्रदायिक राजनीति परवान चढ़ रही थी, हर तरह की विभेदकारी सम्भावनाओं के इस्तेमाल की कोशिश जारी थी और उर्दू के बड़े शायर इकबाल भी उन लोगों में थे, जो पाकिस्तान के विचार के जनक बताए जाते हैं- भारत-विभाजन एक जटिल राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम था।

डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अबुल कलाम आजाद की किताब की भूमिका लिखते हुए ‘भारत विभाजन के गुनहगार’ नाम की जो किताब तैयार कर दी थी, उसमें आठ गुनहगारों का उल्लेख है, लेकिन उनमें उर्दू नहीं है। शायद जावेद अख्तर यह कहना चाह रहे हों कि हिंदी-उर्दू को बांटने वाली राजनीति भी एक वजह है, जो विभाजन की तरफ देश को ले गई।

मगर धर्मों के आधार पर भाषा को न बांटने के बिल्कुल उचित खयाल को क्या हम उर्दू और हिंदी के संदर्भ में अमल में आता देख रहे हैं? वस्तुतः हिंदी और उर्दू बिल्कुल सगी बहनों जैसी हैं, बल्कि उर्दू को कभी हिंदवी और हिंदी भी कहते रहे और हिंदी को भी हिंदुस्तानी बनाने की कोशिश हुई, लेकिन हमारे अवचेतन में ये दो अलग-अलग पहचानों की भाषा के रूप में विकसित होती चली गई हैं।

इस बात को कुछ लोकप्रिय-शास्त्रीय दोनों तरह के उदाहरणों से समझा जा सकता है। मिसाल के तौर पर हिंदी फिल्मों के संवादों को देखें। इन फिल्मों में अगर राजा मुसलमान हुआ तो उसे बादशाह कहने का चलन है और अगर हिंदू हुआ तो उसे सम्राट कहने का। अगर बादशाह अकबर संवाद बोल रहे हैं तो उर्दूनिष्ठ हिंदी में बोलते मिलेंगे और अगर महाराणा प्रताप संवाद बोल रहे हैं तो संस्कृतनिष्ठ हिंदी में बोलते मिलेंगे। जबकि सच यह है कि उस मध्यकाल में न अकबर उर्दू बोलते थे और न राणा प्रताप वैसी हिंदी बोलते थे, जिसमें वे सिनेमा में बोलते दिखाई पड़ते हैं। जाहिर है, हमारे अवचेतन में उर्दू मुसलमानों की और हिंदी हिंदुओं की भाषा होती चली गई है।

इस हादसे का ज्यादा अफसोसनाक प्रमाण विष्णु खरे की कविता ‘गुंग महल’ है, जिसमें ईश्वर की भाषा के सवाल पर बहस कर रहे पंडित जब संस्कृत के पक्ष में तर्क देते हैं तो तत्समनिष्ठ हिंदी में देते हैं और जब मौलवी अरबी के अल्लाह की जुबान होने का दावा करते हैं तो उर्दू में करते हैं। क्या विष्णु खरे जैसे प्रखर कवि को भी एहसास नहीं था कि जाने-अनजाने वे भाषा में डाल दी गई साम्प्रदायिकता के शिकार हो रहे हैं?

हालांकि यह सच है कि हिंदी की शुद्धता के नाम पर जो लोग अरबी-फारसी शब्दों से परहेज करने का आग्रह करते हैं, वे दरअसल हिंदी की ऐतिहासिकता और स्वाभाविकता दोनों के साथ अन्याय करते हैं। क्योंकि हम जो भाषा इस्तेमाल करते हैं, वह अपने मूल में उर्दू के बेहद करीब है और वही हमारी स्वाभाविक जुबान बनती है। हम “घर’ बनाते हैं, “दरवाजे’ खोलते हैं, “दीवारों’ को पहचानते हैं और “बाजार’ जाकर “खरीददारी’ करते हैं। “गृह’ में रहते हुए “द्वार’ खोलकर “भित्तियों’ को पहचानते और “हाट’ जाकर “क्रय-विक्रय’ नहीं करते!

जो लोग लेकिन ऐसी भाषा की वकालत करते हैं, वे दरअसल हिंदी-उर्दू को धार्मिक आधारों पर बांटने की ही कोशिश करते हैं, जैसी कोशिश वे अन्य स्तरों पर भी समाज को बांटने की करते रहते हैं। तो जावेद अख्तर की बात से सहमत होते हुए भी हमें भाषा के साम्प्रदायिकीकरण के खतरे से बचना होगा, जो हमारे अवचेतन में चला आया है। भाषाओं को बचाना है तो आपसदारी से बचाना होगा, दीवारें खड़ी करके, उनके रास्ते रोक कर नहीं।

हमें भाषाओं के साम्प्रदायिकीकरण के खतरे से बचना होगा, जो समय के साथ हमारे अवचेतन में चला आया है। अगर भारतीय भाषाओं को बचाना है तो आपसदारी से बचाना होगा, दीवारें खड़ी करके, उनके रास्ते रोक कर नहीं।

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