जन सुरक्षा की घातक अनदेखी, सिस्टम की असंवेदनशीलता हो रही उजागर
जन सुरक्षा की घातक अनदेखी, सिस्टम की असंवेदनशीलता हो रही उजागर
नोएडा में इंजीनियर युवराज मेहता की कार कोहरे के कारण पानी भरे बेसमेंट में गिरने से हुई मौत ने प्रशासनिक लापरवाही और जन सुरक्षा की अनदेखी को उजागर किया है। लगभग 90 मिनट तक जीवित रहने के बावजूद, बचाव दल की अक्षमता के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका। यह घटना शहरी निकायों, विकास एजेंसियों और आपातकालीन सेवाओं की गहरी असंवेदनशीलता को दर्शाती है, जो देश भर में सुरक्षा मानकों की अनदेखी करती हैं।
- नोएडा में इंजीनियर की मौत प्रशासनिक लापरवाही का सीधा नतीजा।
- निर्माणाधीन स्थल पर सुरक्षा उपायों की घोर अनदेखी उजागर हुई।
- बचाव दल की अक्षमता और समन्वय का अभाव जानलेवा साबित हुआ।
…नोएडा में 27 साल के इंजीनियर युवराज मेहता की मौत न किसी युद्धभूमि पर हुई, न किसी प्राकृतिक आपदा में, बल्कि उस सामान्य सड़क के किनारे पर हुई, जिस पर हम रोज बेफिक्री से सफ़र करते हैं। इस युवा की कार कोहरे के कारण एक निर्माणाधीन माल के पानी भरे में बेसमेंट में जा गिरी और तमाम लोगों की उपस्थिति में उसकी उसमें डूबने से मौत हो गई।
यह घटना हमारे नगर निकायों, विकास एजेंसियों और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणालियों की गहरी असंवेदनशीलता को उजागर करती है। हादसे के बाद युवराज लगभग 90 मिनट तक जीवित था। उसकी कार एक गड्ढेनुमा बेसमेंट में इसलिए जा गिरी, क्योंकि उसे बिना बैरिकेड, चेतावनी बोर्ड, रोशनी या रिफ्लेक्टर के खुला छोड़ दिया गया था। ठंडे पानी में वह अकेला संघर्ष करता रहा और मदद की गुहार लगाता रहा। उसके पिता भी मौके पर पहुंचे और बचाव दल के कर्मचारी भी, पर वे लगभग दो घंटे तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं कर सके।
कभी ठंडे पानी का हवाला दिया, तो कभी उपकरणों की कमी का बहाना बनाया। युवराज प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हुआ। ऐसी घटनाओं पर जन आक्रोश स्वाभाविक है। ये अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। ये एक गहरी और लगातार बनी रहने वाली प्रणालीगत विफलता के लक्षण हैं। ऐसे खतरे हर शहर में मौजूद हैं, बस तब तक अनदेखे रहते हैं, जब तक किसी की जान नहीं चली जाती। किसी भी त्रासदी को समझने के लिए उसके पहले की लापरवाही की श्रृंखला को देखना जरूरी है। नोएडा में जिस गड्ढे में युवराज की कार गिरी, वहां पहले भी सड़क किनारे कटाव और पानी भरने को लेकर चेतावनियां दी गई थीं। फिर भी कुछ नहीं किया गया। न बैरिकेड थे, न चेतावनी संकेत और न ही पर्याप्त रोशनी, जबकि ये बुनियादी सुरक्षा उपाय हैं।
देश भर में शहरी विकास प्राधिकरण, नगर निगम और लोक निर्माण विभाग सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते दिखाई देते हैं। खुले नाले, बिना ढकी सीवर लाइनें, सड़क किनारे खुदाई और गड्ढे आम हो चुके हैं। सड़कों पर पड़ी निर्माण सामग्री यातायात को संकरा भी करती है और रात में गंभीर खतरा भी पैदा करती है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब सड़कें महीनों तक खोदकर छोड़ दी जाती हैं और निर्माण सामग्री बिना रिफ्लेक्टर के बिखरी रहती है। कम रोशनी में वह दिखती नहीं।
ये व्यवस्थागत विफलताएं हैं, जिन्हें हम तब तक अनदेखा करते रहते हैं, जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए। इस स्थिति के लिए केवल सरकारी एजेंसियां जिम्मेदार नहीं। बिल्डर सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते हैं, खनन माफिया ओवरलोडेड वाहनों से सड़कों को नुकसान पहुंचाते हैं और छोटे ट्रक भार सीमा की अनदेखी करते हैं। मुनाफे को मानव जीवन से ऊपर रखा जाता है। स्थिति तब और बिगड़ती है जब प्रशासन चुप्पी साध लेता है। उदासीनता, राजनीतिक दबाव, भ्रष्टाचार और प्रभावशाली गठजोड़ के कारण निगरानी कमजोर पड़ जाती है और उल्लंघन बिना रोक-टोक जारी रहते हैं। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर में खतरनाक सड़कों को लेकर लोक निर्माण विभाग के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने का मेरा अनुभव यही दर्शाता है। गलती सुधारने के बजाय पूरा तंत्र खुद को बचाने में जुट गया। यह मानसिकता आज भी मौजूद है।
एक परिचित सड़क पर चलते हुए किसी भी चालक को पानी से भरे गड्ढे का सामना नहीं करना चाहिए। कोहरे का बहाना भी स्वीकार्य नहीं, क्योंकि सर्दियों में वह होता ही है। गंभीर बात यह है कि नोएडा में उसी स्थान पर कुछ दिन पहले ऐसा ही हादसा हो चुका था, फिर भी सुरक्षा उपाय नहीं किए गए। वह उच्च जोखिम वाले ‘ब्लैक स्पाट’ था, क्योंकि वहां खराब रोशनी, अंधा मोड़, जमा पानी और गहरा गड्ढा था। कई आपातकालीन एजेंसियां घटनास्थल पर गईं, लेकिन उनके पास न पर्याप्त उपकरण थे, न समन्वय और न ही तत्परता। जब पुलिस, एसडीआरएफ और फायर सर्विस जैसी प्रणालियां मौजूद हों, तो ऐसी असहाय स्थिति अक्षम्य है।
यह त्रासदी पूरी तरह रोकी जा सकती थी। खतरे की पहचान पहले ही हो जानी चाहिए थी। सड़क के पास किसी भी खुदाई को बैरिकेड, रिफ्लेक्टर, चेतावनी लाइट और रेलिंग से सुरक्षित करना अनिवार्य है। अंधे मोड़ कभी भी असुरक्षित जल निकायों की ओर नहीं खुलने चाहिए। निर्माण स्थलों को रात भर असुरक्षित छोड़ने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। सुरक्षा आडिट अनिवार्य हों और नागरिक शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो। यदि बेहतर सुसज्जित एसडीआरएफ टीम को समय रहते बुलाया जाता और वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत सूचित किया जाता, तो शायद परिणाम अलग हो सकता था। आपातकालीन दलों का काम जोखिम से बचना नहीं, बल्कि उससे निपटना है।
जहां नोएडा ने बुनियादी ढांचे की विफलता दिखाई, वहीं इंदौर ने नागरिक स्वास्थ्य सुरक्षा की कमजोरी को उजागर किया। बदबूदार पानी की शिकायतों के बावजूद समय रहते कार्रवाई नहीं हुई और दूषित पानी से कई लोग मर गए। यह उस शहर में हुआ, जिसे स्वच्छता के लिए सराहा जाता है। दिखावटी उपलब्धियां वास्तविक सार्वजनिक स्वास्थ्य सतर्कता का विकल्प नहीं हो सकतीं। हम प्रायः टूटी सड़कों, रिसती पाइपलाइनों और असुरक्षित निर्माण को सामान्य मान लेते हैं। शासन निवारक होने के बजाय प्रतिक्रियात्मक बन जाता है। त्रासदी के बाद जवाबदेही थोड़ी देर दिखती है और फिर गायब हो जाती है।
जन सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। दुर्घटना-बहुल ब्लैक स्पाट की पहचान, अनिवार्य सुरक्षा उपाय, निर्माण स्थलों का नियमित आडिट, लापरवाही पर सख्त दंड, समयबद्ध शिकायत निवारण और सशक्त आपातकालीन इकाइयां आवश्यक हैं। जन सुरक्षा के बिना होने वाला विकास प्रगति नहीं है। बुनियादी ढांचा जीवन बचाने के लिए होता है, उसके साथ जुआ खेलने के लिए नहीं। यदि हम एक्सप्रेसवे बना सकते हैं और उपग्रह प्रक्षेपित कर सकते हैं, तो सुरक्षित सड़कें, स्वच्छ पेयजल और प्रभावी आपातकालीन प्रणालियां भी सुनिश्चित कर सकते हैं। कमी संसाधनों की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति की है। जब तक जवाबदेही तय कर उसे सख्ती से लागू नहीं किया जाता और लापरवाही को आपराधिक दृष्टि से नहीं देखा जाता, तब तक ऐसी त्रासदियां दोहराती रहेंगी। वास्तविक सुधार ही एकमात्र रास्ता है, वरना हम अगली त्रासदी का इंतजार ही करते रहेंगे।

