वीआईपी से कौन उलझे मी लार्ड?
वीआईपी से कौन उलझे मी लार्ड?
जिस देश में संविधान देश के हर नागरिक को समान समझता है उसी देश में अदालतें खास आदमियों के खिलाफ कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं है. इस खास आदमी को वीआईपी कहा जाता है. ये संविधान को धता बताता है. भारत में वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान नहीं है लेकिन वीआईपी अगर दुधमुंहा बच्चा भी है तो उसके लिए हर जगह खास इंतजाम हैं.इन्हे चुनौती देने वाले अदालत की नजर मेंश्रद्धालु नहीं हैं.
आपको जानकर हैरानी होगी कि देश के सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन के महाकाल मंदिर में भेदभाव का आरोप लगाने वाली उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें वीआईपी दर्शन पर रोक लगाने और सभी के लिए बराबर अवसर की मांग की गई थी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि इस तरह की याचिका दायर करने वाले असली श्रद्धालु नहीं होते हैं, बल्कि उनका उद्देश्य कुछ और होता है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि ऐसे विषयों पर गाइडलाइंस या नीति बनाना उसका काम नहीं हैं.
दर्पण अवस्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए सीजेआई सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि इस तरह की याचिका लगाने वाले असली श्रद्धालु नहीं होते। सीजेआई ने कहा, ‘वे श्रद्धालु नहीं है। हम आगे इस पर बोलना नहीं चाहते हैं। इन लोगों का उद्देश्य कुछ और होता है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह फैसला करने का काम कोर्ट का नहीं है। हम न्यायिक प्रक्रिया के लिए हैं।’ याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया किंतु याची को सरकार के सामने आवदेन लगाने की अनुमति दी।
याचिकाकार्ता की ओर से पेश हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर समान नीति होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हो रहा है। सभी के लिए समान नियम होना चाहिए। वीआईपी स्टेटस के आधार पर नागरिकों से भेदजभाव नहीं किया जा सकता है। यदि कोई कलेक्टर की सिफारिश में गर्भगृह में प्रवेश कर रहा है, तो महाकाल जाने वाले दूसरे श्रद्धालुओं को भी वहां जाकर देवता को जल चढ़ाने की अनुमति मिले।’
उल्लेखनीय है कि अवस्थी ने इससे पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वीआईपी श्रद्धालुओं को गर्भगृह में जाकर जल चढ़ाने और आम लोगों को ऐसा करने की अनुमति नहीं होने को भेदभाव बताते हुए रोक की मांग की थी। हाई कोर्ट से निराशा मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
मजे की बात है कि हमारी अदालतें एक ओर धर्म से जुड़े मामले सुनना नहीं चाहती, दूसरी ओर वे असली-नकली शंकराचार्य का मामला सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं.महाकाल मंदिर ही नहीं हर मंदिर में वीआईपी को आम आदमी से ज्यादा महत्व दिया जाता है. अदालत में फैसला करने वाले जिला जज से लेकर सीजेआई तक वीआईपी का लेबिल चस्पा करने में आनंदित होते हैं.
वीआईपी की न कोई जाति होती है न धर्म न लिंग न आयु. वीआईपी ईश्वर की बनाई विशेष कृति होती है.क्योंकि
वीआईपी संस्कृति का उद्भव सत्ता प्रतिष्ठान से जुडा है.वीआईपी संस्कृति की जड़ें सत्ता, पद और विशेषाधिकार में हैं।जैसे ही समाज ने कहा—“सब बराबर हैं, लेकिन कुछ थोड़े ज़्यादा बराबर हैं”बस वहीं से वीआईपी पैदा हो गया.
राजशाही में राजा-महाराजा, अंगरक्षक, हाथी-घोड़े, दरबार—यहीं से “विशेष व्यक्ति” की अवधारणा बना दी.अंग्रेज़ साहब आए, क्लब.वीआईपी का मतलब हुआ—किसे अंदर जाने की इजाज़त है।
स्वतंत्र भारत में संविधान ने कहा—सब नागरिक समान हैं लेकिन व्यवहार ने कहा—पर कुछ को ज़ेड+ सुरक्षा,नेता, अफ़सर, जज, बाबू,लाल बत्ती, सायरन, प्रोटोकॉल,सड़क खाली, जनता ट्रैफ़िक में.धीरे-धीरे वीआईपी व्यक्ति नहीं रहा,वीआईपी “आदत” बन गई।आधुनिक वीआईपी संस्कृति में वीआईपी: स्टेटस सिंबल है.अब वीआईपी होने के लिए सत्ता भी ज़रूरी नहीं.सोशल मीडिया फॉलोअर = नया प्रोटोकॉल.स्टार, बाबा, कारोबारी.“इनसे मिलवाइए”, “इनका ध्यान रखिए”और जनता?“वीआईपी मूवमेंट है, पाँच मिनट रुकिए”पाँच मिनट… पचास साल से. नतीजा? लोकतंत्र में समानता कमज़ोर,सत्ता अहंकार में बदलती,और नागरिक दर्शक बनता जाता है।केंद्र सरकार की तरफ से 19,467 लोग वीआईपी माने गए,जिनके लिए 66,000 पुलिसकर्मी तैनात करना पडे.
मेरे ख्याल से असल में लोकतंत्र की असफलता का उत्सव है।जहाँ जनता राजा होती है,वहाँ राजा जनता से डरे—लेकिन यहाँ राजा को बचाने के लिए पूरी जनता को रोक दिया जाता है

