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जानें क्यों नजदीक पहुंच गई प्रलय की घड़ी डूम्सडे क्लॉक?

 आधी रात से केवल 85 सेकंड दूर, जानें क्यों नजदीक पहुंच गई प्रलय की घड़ी डूम्सडे क्लॉक?

Doomsday Clock: डूम्सडे क्लॉक अब आधी रात से ठीक 85 सेकंड पहले पर सेट हो चुकी है. आइए जानते हैं क्या है इसका मतलब और आखिर क्यों है यह चिंता की बात.

डूम्सडे क्लॉक एक प्रतीकात्मक पैमाना है कि इंसानियत खुद को खत्म करने के कितने करीब है. इसमें आधी रात ग्लोबल तबाही को दिखाती है. आधी रात से जितने कम सेकंड बचे होते हैं इंसानी हरकतों से पैदा होने वाले जोखिम उतने ही ज्यादा होते हैं. यह बस एक दिशा दिखाती है ना की कोई सटीक भविष्यवाणी करती है.
यह घड़ी 1947 में शुरू की गई थी. इसे हिरोशिमा और नागासाकी पर एटॉमिक बम गिरने के कुछ समय बाद शुरू किया गया था. वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि इंसानों द्वारा बनाए गए हथियार उस लेवल तक पहुंच चुके हैं जहां वे सभ्यता को खत्म कर सकते हैं. यह घड़ी सरकारों और समाजों को न्यूक्लियर पावर और बिना रोक-टोक के साइंटिफिक तरक्की के खतरों के बारे में चेतावनी देती है.
डूम्सडे क्लॉक का समय बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट के साइंस एंड सिक्योरिटी बोर्ड द्वारा तय किया जाता है. इस ग्रुप में नोबेल पुरस्कार विजेता, न्यूक्लियर साइंटिस्ट, क्लाइमेट रिसर्चर और एआई स्पेशलिस्ट शामिल होते हैं. यह साइंटिफिक सबूत और जियोपॉलीटिकल डेवलपमेंट के आधार पर ग्लोबल जोखिमों का आकलन करते हैं.
न्यूक्लियर युद्ध एक बड़ी चिंता बनी हुई है और अब यह घड़ी कई खतरों को दिखाती है. इनमें देश के बीच सशस्त्र संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, महामारी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का गलत इस्तेमाल, साइबर युद्ध और हथियार नियंत्रण समझौता का टूटना शामिल है.
2024 से 2025 तक घड़ी को आधी रात से सिर्फ 85 सेकंड पहले सेट किया गया था. यह इसके इतिहास में सबसे करीब है. इससे ग्लोबल संघर्ष, न्यूक्लियर तनाव, कमजोर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, जलवायु पर कार्रवाई की कमी और मजबूत नैतिक नियंत्रण के बिना तेजी से आगे बढ़ती टेक्नोलॉजी के बारे में पता चल रहा है.
वैज्ञानिकों का ऐसा कहना है की स्थिति काफी गंभीर है लेकिन इसे बदला जा सकता है. न्यूक्लियर हथियारों को कम करना, युद्ध खत्म करना, नई टेक्नोलॉजी को कंट्रोल करना, क्लाइमेट चेंज से निपटना और लोकतांत्रिक संसाधनों को मजबूत करने जैसे कदम इस मुसीबत से निपटने में मदद कर सकते हैं.

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