क्राइममध्य प्रदेश

78 करोड़ का घोटाला:जिन्हें आरोपी बनाया वे कर्मचारी नहीं, एईसी की भूमिका संदिग्ध !!!

78 करोड़ का घोटाला:जिन्हें आरोपी बनाया वे कर्मचारी नहीं, एईसी की भूमिका संदिग्ध

इंदौर में दिसंबर 2015 से जुलाई 2017 के बीच हुए 78 करोड़ रुपए के आबकारी घोटाले में जांच एजेंसियों की दिशा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जिन अंश त्रिवेदी और राजू दसवंत को मुख्य आरोपी बनाया है, वे न तो आबकारी विभाग के कर्मचारी हैं और न ही शराब के लाइसेंसी। इसके उलट, घोटाले के दौरान पदस्थ रहे सहायक आबकारी आयुक्त (एईसी) की भूमिका और निगरानी में गंभीर चूक सामने आ रही है।

इस पूरे मामले की शिकायत खुद आबकारी विभाग से ही दर्ज कराई गई थी। वर्ष 2017 में तत्कालीन सहायक जिला आबकारी अधिकारी राजीव प्रसाद द्विवेदी ने इंदौर के रावजी बाजार थाने में एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें 14 लोगों को आरोपी बनाया गया, जिनमें राजू दसवंत और अंश त्रिवेदी भी शामिल थे।

इसके बावजूद, विभागीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। जांच में सामने आया है कि घोटाले के दौरान बैंक चालानों में कूट रचना की गई। 10 हजार रुपए के चालान को फर्जी तरीके से 1 लाख रुपए का दिखाया गया और इसी आधार पर ठेकेदारों ने सरकारी गोदाम से करीब 41 करोड़ रुपए की शराब उठा ली।

हैरानी की बात यह है कि लगातार दो साल तक इन चालानों का ट्रेजरी से सत्यापन नहीं कराया गया, जबकि मासिक तौजी की जांच अनिवार्य थी। यदि समय पर सत्यापन होता, तो यह घोटाला उसी वक्त पकड़ में आ सकता था।

सरल भाषा में पढ़ें घोटाले की पूरी कहानी

जिस अवधि में यह फर्जीवाड़ा हुआ, उस दौरान संजीव दुबे इंदौर में सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ थे। शासकीय रिकॉर्ड के अनुसार उनकी पोस्टिंग 11 नवंबर 2015 को हुई और इसके ठीक अगले महीने यानी दिसंबर 2015 से यह घोटाला शुरू हो गया, जो जुलाई 2017 तक चलता रहा। सवाल यह है कि इतने लंबे समय तक चालान, गोदाम से उठाव और मासिक तौजी की निगरानी आखिर किस स्तर पर फेल हुई।

घोटाला उजागर होने के बाद भी मामला यहीं नहीं रुका। वर्ष 2018 में आबकारी आयुक्त स्तर से एकल नस्ती जारी कर आरोपित लाइसेंसियों को करीब 40 करोड़ रुपए का लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। बाद में शासन को 2022 में इस नस्ती को निरस्त करना पड़ा।

नई गणना के बाद घोटाले की राशि 71 करोड़ रुपए तय की गई, जिसे ईडी ने भी अपनी जांच में सही माना। ईडी की रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि यह घोटाला आबकारी अफसरों और ठेकेदारों की सांठगांठ के बिना संभव नहीं था।

अब मामला लोकायुक्त में दर्ज प्रकरण और ईडी की समानांतर जांच के दायरे में है। प्रमुख सचिव आबकारी अमित राठौर ने आबकारी आयुक्त अभिजीत अग्रवाल से यह स्पष्ट रूप से पूछा है कि यदि लाइसेंसियों से पूरी राशि की वसूली नहीं की गई, तो यह राजस्व हानि दोषी अधिकारियों से कैसे वसूली जाएगी। इस जांच के लिए जीएसटी विभाग की अपर आयुक्त रजनी सिंह को नामित किया गया है, जिनकी रिपोर्ट शीघ्र ही सौंपे जाने की संभावना है।

घोटाले के सामने आने के बाद 22 करोड़ रुपए नकद जमा किए जाने का मामला भी जांच के घेरे में है। यह रकम कहां से आई, किसके कहने पर जमा कराई गई और इसका स्रोत क्या है? इसकी मनी लॉन्ड्रिंग एंगल से ईडी जांच कर रही है।

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