पिछले एक दशक के दौरान दुनिया जितनी तेजी से बदली है, उसे देखते हुए अगले दस-बीस वर्षों के संभावित परिवर्तनों की थाह लेना आवश्यक हो गया है। मानव इतिहास के अधिकांश दौर में अभाव जैसे पहलू ने ही सभ्यताओं का तानाबाना रचा है। फिर चाहे यह खानपान का अभाव हो, जमीन, श्रम, पूंजी या कालांतर में ज्ञान का। हमारे आर्थिक सिद्धांतों का उद्भव एवं राजनीतिक संस्थानों का विकास भी अभाव प्रबंधन पर केंद्रित रहा।

मशीनी कौशल यानी एआइ में इस पारंपरिक परिदृश्य को पलटने की क्षमता है। यदि बीसवीं सदी अभावों से पार पाने से जुड़ी थी तो आने वाला दशक अधिशेष के साथ संतुलन की चुनौती के नाम हो सकता है। नए परिदृश्य में तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उस लिहाज से हमारी संस्थाएं पिछड़ती जा रही हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि उन नीतिगत उपायों पर विचार किया जाए जो एआइ से उत्पन्न उथल-पुथल से निपटने में कारगर साबित हो सकें।

पारंपरिक अर्थशास्त्र में उत्पादन के चार प्रमुख कारक-श्रम, पूंजी, भूमि और तकनीक माने गए हैं। तकनीक ने हमेशा श्रम को सहयोग प्रदान किया है। प्रत्येक तकनीकी संक्रमण उत्पादकता एवं पारिश्रमिक बढ़ाने के साथ ही मांग के विस्तार और नई नौकरियों का माध्यम बना है। इससे कुछ असुविधा होती भी थी तो बस तात्कालिक ही न कि स्थायी, मगर एआइ से यह रुझान पलट सकता है। पहली बार तकनीक सीधे तौर पर श्रम को प्रतिस्थापित करती दिख रही है।

न केवल शारीरिक श्रम, बल्कि बौद्धिक, पेशेवर और रचनात्मक कामकाज के मामले में भी एआइ प्रभुत्व दिखा रही है। एआइ के साथ उत्पादकता तो बढ़ रही है, पर रोजगार सृजन उस हिसाब से नहीं हो रहा है। इससे साझा समृद्धि की राह प्रशस्त होने से रही। यानी विषमता बढ़ेगी। प्रकृति और स्वरूप में भी एआइ पिछली तकनीकों की तुलना में अलग है। इसका कोई प्रतिरूप एक बार आकार लेने पर यह सीमांत लागत को शून्य तक करने में सक्षम है। यह स्वाभाविक रूप से एकाधिकार की स्थिति निर्मित करता है। कुछ देशों की चुनिंदा कंपनियों द्वारा विशेष प्रतिरूपों में महारत हासिल करने से यह झलकता भी है।

तमाम विश्लेषकों को आशंका सता रही है कि एआइ बड़े स्तर पर हलचल मचा सकती है। यह मानव समाज के संतुलन को भी प्रभावित करने में सक्षम है। आज उत्पादकता और क्षमताएं निरंतर बढ़ रही हैं। वस्तुएं सस्ती हो रही हैं। सेवाओं का स्तर सुधरा है। भौतिक जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। एआइ को सफलतापूर्वक अपनाने वाले देश तेज आर्थिक वृद्धि कर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में जबरदस्त सुधार हुआ है। जीवन प्रत्याशा बढ़ी है और बीमारियों पर बोझ घट रहा है। जीवन के विस्तार और काम का दायरा सिकुड़ने पर जननांकीय लाभांश अपने अर्थ खो देता है।

इस परिदृश्य में विदेश से भेजी जाने वाली धनराशि पर निर्भर राष्ट्र-समाज समस्याओं का सामना करते हैं। तब गरिमा और आजीविका के आधार के रूप में रोजगार का विचार संकट का शिकार होने लगता है। संसाधनों का संकेंद्रण भी एआइ के मोर्चे पर पैदा होने वाली एक और समस्या है। ऐसे में संसाधनों के पुनर्वितरण के लिए कोई कारगर नीतिगत उपाय खोजना ही होगा। इसके अभाव में व्यापक आर्थिक दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है।

एआइ के चलते सीखने-समझने की क्षमताओं पर भी संकट मंडराता दिख रहा है। जब मशीन ही फैसले लेने में भूमिका निभाने लगेगी तो लोगों में सीखने के प्रति झुकाव घटने का अंदेशा बढ़ता है। इतिहासकार डेविड रोकलिन ने यह रेखांकित भी किया था कि आटो-पायलट मोड पर अत्यधिक निर्भरता संकट के समय पायलटों के हाथ-पांव फुला देती है। बड़ा खतरा यह नहीं कि मशीन किसी इंसान की भांति काम करे, बल्कि यह खतरा कहीं विकराल होगा कि इंसान ही मशीन की तरह व्यवहार करने लगे।

एआइ की वजह से फर्जी सूचनाओं और तमाम संदिग्ध सामग्री का सैलाब भी संकट बढ़ा रहा है। इससे भरोसे की भावना पर आघात पहुंचा है। सत्य और मिथ्या को लेकर ऐसा जाल बुना जा रहा है कि लोग भ्रमित हो रहे हैं। एआइ पर पकड़ रखने वाले और ताकतवर बनने की राह पर हैं। इसके दम पर नव-धनकुबेरों का उभार हो रहा है।

भू-राजनीतिक संदर्भ में भी एआइ विषमता बढ़ा रही है, क्योंकि आधुनिक तकनीक से वंचित देश स्वत: पिछड़ते जाएंगे। किसी देश की संप्रभुता पर किसी अन्य देश से संचालित हो रहे एलगोरिदम से ग्रहण लग सकता है। इस सबके बावजूद अगर सही नीतिगत उपाय किए जाएं तो एआइ बहुत सकारात्मक परिवर्तन भी कर सकती है। इसके लिए एआइ को तकनीकी उपकरण से अधिक सभ्यतागत शक्ति के रूप में देखना होगा। एआइ का उपयोग मानव की जगह लेने के बजाय उसकी क्षमताओं को बढ़ाने पर केंद्रित होना चाहिए।

एआइ उन तमाम समस्याओं का समाधान करने में सक्षम है, जिसके लिए असाधारण मानवीय प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है। जैसे कि बाहरी-अंतरिक्ष में कोई नया मोर्चा खोलना, गहरे समुद्र या पृथ्वी की जटिल परतों के रहस्यों को सुलझाना। इससे कई ग्रहों पर मानवीय जीवन को संभव बनाया जा सकता है। हम प्रकृति को बेहतर तरीके से समझकर उसके कुशल प्रबंधन के मंत्र समझ सकते हैं। तथ्यों एवं सूचनाओं के सत्यापन के लिए भी इसकी सेवा कारगर होगी।

यह स्वीकारने में कोई संदेह नहीं कि एआइ कितनी भी क्षमताएं अर्जित कर ले, लेकिन उसका प्यार, देखभाल, समानुभूति और नैतिक दायित्वों जैसी मानवीय भावनाओं से युक्त होना संभव नहीं है। एआइ से मरीज का उपचार भले ही बेहतर हो जाए, लेकिन प्यार-दुलार और देखभाल प्रियजनों से ही संभव है। हमें समझना होगा कि एआइ कोई प्रतिस्पर्धी लाभ नहीं, बल्कि एक साझा दायित्व है। वसुधैव कुटुंबकम् का भारतीय विचार अब दर्शन के दायरे से निकलकर अस्तित्व की रणनीति का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में, भारत अपनी सभ्यतागत गहराई और विश्वसनीयता के माध्यम से नए शासकीय ढांचों के लिए वैश्विक एआइ मानदंडों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।