…. संसद के बाहर सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं के आपसी रिश्ते कैसे भी हों, संसद के भीतर और यहां तक कि संसद परिसर में भी उनके बीच एक तरह का बैर भाव दिखता है। इसका एक उदाहरण राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बीच के उस संवाद से मिला, जिसमें राहुल गांधी ने जब बिट्टू को गद्दार दोस्त कहा तो जवाब में उन्हें उनसे देश का दुश्मन सुनना पड़ा।

इसके पहले राहुल गांधी की उपस्थिति में ही पक्ष-विपक्ष के सांसदों के बीच धक्कामुक्की भी हो चुकी है, जिसमें सत्तापक्ष के एक सांसद प्रताप सिंह सारंगी को चोट भी लगी थी। इस मामले में एफआइआर भी दर्ज हुई थी। पता नहीं उसका क्या हुआ। संसद के भीतर तो पक्ष-विपक्ष के बीच न जाने कितनी बार झड़प हो चुकी है। विपक्षी सांसदों को कई बार उनके उग्र और अमर्यादित व्यवहार के लिए निलंबित भी किया जा चुका है। पिछले दिनों भी लोकसभा से आठ सांसदों को निलंबित किया गया। जब ऐसा होता है तो संसद का चलना और कठिन हो जाता है।

यह बहुत आम है कि संसद के प्रत्येक सत्र के प्रारंभ में कई दिनों तक केवल हंगामा होता रहता है। इस सत्र में लोकसभा में कई दिन तक इसलिए हंगामा होता रहा, क्योंकि राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के समय चीन के अतिक्रमणकारी रवैये को लेकर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के हवाले से कुछ कहना चाह रहे थे। उन्हें इस आधार पर इसकी अनुमति नहीं मिली, क्योंकि यह पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं हुई है। राहुल गांधी का तर्क था कि वे एक पत्रिका में पुस्तक के अंश का उल्लेख करना चाह रहे हैं। उन्हें इसकी भी अनुमति नहीं मिली। इस पर हंगामा शुरू हो गया, जो कई दिनों तक जारी रहा। हालांकि राहुल गांधी इस पुस्तक के एक पत्रिका में प्रकाशित अंश को प्रमाणित करने का दावा कर रहे थे, लेकिन इसके बाद भी उन्हें अपनी बात कहने की इजाजत नहीं दी गई। इस पर जो हंगामा शुरू हुआ, वह कई दिनों तक जारी रहा।

जनरल नरवणे ने अपनी पुस्तक में क्या लिखा है, इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं, क्योंकि रक्षा मंत्रालय ने इस पुस्तक के प्रकाशन की अनुमति नहीं दी है, पर उसके कुछ अंश सार्वजनिक हो चुके हैं। राहुल गांधी इन्हीं अंशों का लोकसभा में उल्लेख कर यह कहना चाहते थे कि जब चीनी सेना आक्रामक रवैया अपनाए थी, तब प्रधानमंत्री ने साहस का परिचय नहीं दिया और उन्होंने सेना को समुचित निर्देश भी नहीं दिए। कोई भी समझ सकता है कि वे यही साबित करना चाह रहे हैं कि प्रधानमंत्री चीन की आक्रामकता से डर गए। राहुल गलवन की घटना के बाद से ही यह साबित करने की कोशिश करते चले आ रहे हैं कि प्रधानमंत्री चीन के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से हिचक गए। उनका यह रवैया नया नहीं है। जब डोकलाम में भारतीय और चीनी सैनिक आमने-सामने थे, तब उन्होंने विवाद समझने के लिए भारतीय विदेश या रक्षा मंत्रालय से संपर्क साधने के बजाय चीनी राजदूत से मिलना आवश्यक समझा था। वे विदेश मंत्रालय को सूचित किए बिना गुपचुप रूप से उनसे मिलने पहुंच गए थे।

राहुल गांधी प्रधानमंत्री को कमजोर साबित करने के लिए यह भी दावा करते रहे हैं कि उनके पीएम रहते चीन ने भारतीय भूमि पर कब्जा कर लिया है। वे एक बार यहां तक कह गए थे कि चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं। इस पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट की फटकार का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा। वे राफेल विमान सौदे पर प्रधानमंत्री को भ्रष्ट साबित करने के लिए यह कह भी चुके हैं कि उन्होंने अपने मित्रों को दलाली खाने का अवसर दिया। इस पर भी उन्हें सुप्रीम कोर्ट की फटकार सुननी पड़ी थी, लेकिन उनकी सेहत पर असर नहीं पड़ा। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के मामले में उनका दावा है कि चुनाव आयोग मोदी सरकार के इशारे पर ऐसे काम कर रहा है कि भाजपा को चुनावी लाभ मिले। उन्होंने लोकसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त को खूब खरी-खोटी सुनाई थी और एक तरह से उन्हें देख लेने की धमकी दी थी। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उनके इस दावे का दम निकाल दिया कि चुनाव आयोग भाजपा के कहने पर विपक्षी मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा रहा है, लेकिन वे वोट चोरी के अपने दावे पर अडिग हैं और यह साबित करने पर भी तुले हैं कि चुनाव आयोग और भाजपा में मिलीभगत है।

राहुल गांधी अब यह साबित करना चाहते हैं कि किसी मजबूरी में आकर प्रधानमंत्री ने भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने वाले व्यापार समझौते पर सहमति दी और इस तरह अमेरिका के सामने समर्पण कर दिया। आपरेशन सिंदूर के समय भी राहुल गांधी का यही दावा था कि मोदी ने अमेरिकी दबाव के समक्ष घुटने टेक दिए। समस्या यह है कि भाजपा को यह लगता है कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ भी बोलने से वे सचमुच कमजोर या भारतीय हितों से समझौता करने वाले या फिर अक्षम शासक दिखने लगते हैं। यदि ऐसा होता तो आज शायद भाजपा विपक्ष में और कांग्रेस सहयोगी दलों के साथ सत्ता में होती। जब यह साफ है कि राहुल गांधी के कहने का कोई खास असर नहीं होता तो फिर वे संसद में या संसद के बाहर कुछ भी कहें, भाजपा को उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। उसे उन्हें और अधिक बोलने का मौका देना चाहिए।